Muzaffarnagar की सियासत में रविवार को एक ऐसा राजनीतिक मंच सजा, जहां भाषणों में गठबंधन की मजबूती के दावे खूब हुए, लेकिन मंच और आसपास की कुर्सियों ने भी अपनी अलग कहानी कह दी। राष्ट्रीय लोकदल के पुरकाजी विधानसभा क्षेत्र के कार्यकर्ता सम्मेलन में हजारों कार्यकर्ताओं की मौजूदगी ने आयोजकों को उत्साहित किया तो कई चर्चित भाजपा नेताओं की गैरमौजूदगी ने राजनीतिक गलियारों में सवालों की खिड़की भी खोल दी।
मंच से गठबंधन को मजबूत बताया गया, विकास को प्राथमिकता बताया गया और विपक्ष को अपने गिरेबान में झांकने की सलाह दी गई। लेकिन सियासी कार्यक्रमों में असली मसाला अक्सर भाषण से ज्यादा कौन आया और कौन नहीं आया में छिपा होता है। यहां भी कुछ ऐसा ही हुआ।
कैबिनेट मंत्री अनिल कुमार ने जहां रालोद की बढ़ती ताकत का दावा किया, वहीं कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. संजीव बालियान ने भीड़ देखकर उनकी मेहनत की तारीफ कर दी। बालियान ने कहा कि उन्होंने इतनी भीड़ बहुत दिनों बाद देखी है।
अब राजनीति में तारीफ भी कई तरह की होती है—कुछ मंचीय होती है, कुछ मजबूरी वाली और कुछ ऐसी, जिसे सुनकर सामने वाला पूरे दिन मुस्कुराता रहे। इस कार्यक्रम में कौन-सी तारीफ किस श्रेणी में थी, यह तो नेता ही जानें, लेकिन भीड़ देखकर अनिल कुमार का राजनीतिक आत्मविश्वास जरूर और ऊंचा दिखाई दिया।
मंच पर गठबंधन मजबूत, लेकिन गैरमौजूदगी ने पैदा की ‘कमजोर’ चर्चा
कार्यक्रम में रालोद-भाजपा गठबंधन की मजबूती पर खूब जोर दिया गया। संजीव बालियान ने साफ कहा कि गठबंधन मजबूती के साथ काम कर रहा है और विकास उसकी प्राथमिकता है।
लेकिन इसी बीच कुछ भाजपा नेताओं की गैरमौजूदगी चर्चा का विषय बन गई।
राजनीतिक कार्यक्रमों में किसी नेता का न आना सामान्य बात हो सकती है। व्यस्तता, पूर्व निर्धारित कार्यक्रम, क्षेत्र से बाहर होना या व्यक्तिगत कारण—कुछ भी वजह हो सकती है। मगर जब कार्यक्रम सत्ता गठबंधन का हो, मंच पर बड़े नामों की चर्चा हो और कुछ चर्चित चेहरे दिखाई न दें, तो पत्रकारों के सवाल भी अपने आप पैदा हो जाते हैं।
और यहां भी सवाल पूछे गए।
प्रमोद उटवाल का फोटो बैनर से गायब, सवाल पर मंत्री ने दिया ‘व्यस्तता’ वाला जवाब
मीडिया ने मंत्री अनिल कुमार से पुरकाजी के पूर्व विधायक प्रमोद उटवाल की गैरमौजूदगी को लेकर सवाल किया।
सवाल केवल यह नहीं था कि प्रमोद उटवाल कार्यक्रम में क्यों नहीं आए। चर्चा यह भी हुई कि कार्यक्रम के बैनर पर उनका फोटो तक दिखाई नहीं दिया।
मंत्री अनिल कुमार ने बेहद सहज अंदाज में जवाब दिया कि उन्हें फोन कर दिया गया था, लेकिन शायद वह व्यस्त थे, इसलिए कार्यक्रम में नहीं आ सके।
राजनीति में ‘व्यस्त’ शब्द भी बड़ा कमाल का होता है। कोई पूछे क्यों नहीं आए? जवाब—व्यस्त थे। कौन-सा काम था? यह पूछने वाला खुद राजनीतिक रूप से ‘बहुत उत्सुक’ समझा जा सकता है।
हालांकि मंत्री ने किसी विवाद की पुष्टि नहीं की और गैरमौजूदगी को सामान्य व्यस्तता से जोड़कर ही जवाब दिया।
मंत्री से बड़े नेताओं को लेकर सवाल, जवाब आए लेकिन राज भी नहीं खुले
मीडिया ने केवल पूर्व विधायक तक सवाल सीमित नहीं रखा। उत्तर प्रदेश सरकार और भाजपा से जुड़े कुछ अन्य बड़े नेताओं की गैरमौजूदगी को लेकर भी सवाल उठाने की कोशिश हुई।
लेकिन मंत्री अनिल कुमार ने इन सवालों को बड़े आराम से संभाल लिया।
न कोई खुला विवाद, न कोई तीखा बयान, न किसी नेता पर नाराजगी—बस जवाबों का ऐसा राजनीतिक संतुलन कि सवाल भी रह गया और जवाब भी मिल गया।
यानी मंच पर राजनीति का वह पुराना फॉर्मूला दिखाई दिया—जो बात साफ-साफ न कहनी हो, उसे मुस्कुराकर टाल दीजिए।
संजीव बालियान ने अनिल की तारीफ में नहीं छोड़ी कोई कसर
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. संजीव बालियान ने मंच से कैबिनेट मंत्री अनिल कुमार की जमकर तारीफ की।
उन्होंने कहा कि इतनी भीड़ उन्होंने बहुत दिनों बाद देखी है।
इसके बाद उन्होंने कार्यकर्ताओं की सराहना करते हुए कहा कि इस बार भी पुरकाजी क्षेत्र से अनिल कुमार को शानदार जीत दिलानी है।
सियासत में किसी नेता की सभा में भीड़ को लेकर टिप्पणी सिर्फ प्रशंसा नहीं होती। कभी-कभी यह क्षेत्रीय राजनीतिक समीकरणों का संकेत भी मानी जाती है।
बालियान का संदेश साफ था—अनिल कुमार की जमीन पर पकड़ को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
2012 की याद दिलाकर बालियान ने सुनाया पुराना राजनीतिक ‘फॉर्मूला’
संजीव बालियान ने अपने भाषण में 2012 का जिक्र भी किया।
उन्होंने कहा कि उस समय दोनों अलग-अलग राजनीतिक दलों में थे, लेकिन राजनीति में उन्होंने एक बात सीखी थी कि लड़ाई इतनी ही करनी चाहिए कि भविष्य में गले मिलने का समय आए तो गले मिलते वक्त परेशानी न हो।
यानी राजनीतिक दुश्मनी में भी इतना ‘स्पेस’ छोड़कर चलो कि कल गठबंधन की फोटो में साथ खड़े होने में दिक्कत न हो।
बालियान ने इसी पुराने राजनीतिक अनुभव को आज के गठबंधन से जोड़ते हुए कहा कि उसी फॉर्मूले का परिणाम है कि आज वे एक ही मंच और एक ही सत्ता के साथ बैठे हैं।
राजनीति में रिश्ते स्थायी नहीं होते, समीकरण होते हैं। कल जो प्रतिद्वंद्वी था, आज सहयोगी हो सकता है और आज का सहयोगी कल किस भूमिका में होगा, यह राजनीति का कैलेंडर तय करता है।
अनिल कुमार बोले—रालोद मजबूत हो रहा है, इसलिए विपक्ष परेशान
कैबिनेट मंत्री अनिल कुमार ने कार्यकर्ता सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि राष्ट्रीय लोकदल लगातार मजबूत हो रहा है।
उन्होंने दावा किया कि रालोद की बढ़ती ताकत को देखकर विपक्षी दल उल्टे-सीधे बयान दे रहे हैं।
अनिल कुमार ने विपक्षी दलों को सलाह दी कि वे राष्ट्रीय लोकदल की चिंता छोड़कर अपने गिरेबान में झांकें।
राजनीतिक भाषणों में ‘गिरेबान में झांकने’ वाला मुहावरा पुराना जरूर है, लेकिन चुनावी मौसम के नजदीक आते ही इसकी चमक फिर लौट आती है।
तीन बार विधायक बनाने वाले कार्यकर्ताओं का किया गुणगान
अनिल कुमार ने कहा कि पुरकाजी विधानसभा क्षेत्र के कार्यकर्ताओं ने उन्हें तीन बार अपनी सर आंखों पर बैठाकर विधानसभा भेजा है।
उन्होंने दावा किया कि इन्हीं कार्यकर्ताओं के आशीर्वाद के कारण उन्हें योगी सरकार में मंत्री बनने का अवसर मिला।
मंत्री ने यह भी कहा कि वह लगातार पूरे क्षेत्र का भ्रमण करते हैं और इसी वजह से पुरकाजी क्षेत्र का बच्चा-बच्चा उन्हें जानता है।
राजनीति में ‘बच्चा-बच्चा जानता है’ वाला दावा भी खूब लोकप्रिय है। हर नेता अपने क्षेत्र में यही मानना चाहता है कि सड़क से लेकर चौराहे तक उसकी पहचान सबसे मजबूत है।
अब पुरकाजी के बच्चे इस दावे पर क्या सोचते हैं, इसका सर्वे अभी बाकी है।
जयंत चौधरी को दिया टिकट से मंत्री पद तक का श्रेय
अनिल कुमार ने अपने राजनीतिक सफर में राष्ट्रीय लोकदल प्रमुख जयंत चौधरी की भूमिका का भी उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि जयंत चौधरी ने पहले उन्हें विधानसभा चुनाव का टिकट दिलाया और बाद में मंत्री बनाया।
इस दौरान उन्होंने जयंत चौधरी की योजनाओं और निधि के इस्तेमाल का जिक्र करते हुए कहा कि खेल और युवाओं के भविष्य के लिए धन खर्च किया जा रहा है।
अनिल कुमार ने दावा किया कि वह भी अपने विधानसभा क्षेत्र में लगातार विकास कार्य करा रहे हैं।
विकास का कार्ड सामने, विपक्ष पर हमला साथ-साथ
सम्मेलन में विकास कार्यों को राजनीतिक संदेश का मुख्य आधार बनाया गया।
अनिल कुमार ने कहा कि जिस तरह जयंत चौधरी युवाओं और खेल के लिए काम कर रहे हैं, उसी तरह वह अपने क्षेत्र में विकास कार्य करा रहे हैं।
सियासत में विकास का कार्ड सबसे सुरक्षित कार्ड माना जाता है। इसके साथ विपक्ष पर हमला जोड़ दिया जाए तो भाषण भी पूरा और राजनीतिक संदेश भी पूरा।
यही फॉर्मूला यहां भी दिखाई दिया।
अखिलेश यादव पर अनिल कुमार का निशाना
अनिल कुमार ने समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव पर भी हमला बोला।
उन्होंने आरोप लगाया कि रालोद की बढ़ती लोकप्रियता से अखिलेश यादव बौखला गए हैं और जयंत चौधरी के खिलाफ बयानबाजी कर रहे हैं।
उन्होंने अखिलेश यादव के सोशल मीडिया पोस्ट और चुनावी सीटों से जुड़े आकलनों का जिक्र करते हुए कहा कि उन्हें दूसरी पार्टियों का गणित लगाने के बजाय अपने वोट बैंक की चिंता करनी चाहिए।
यानी सम्मेलन में स्थानीय शक्ति प्रदर्शन के साथ प्रदेश की राजनीति का हिसाब-किताब भी मंच पर खोल दिया गया।
‘दूसरों की सीटें गिनने से पहले अपना वोट बैंक देखिए’
अनिल कुमार ने विपक्षी दलों को रालोद के बजाय अपनी चिंता करने की सलाह दी।
उनका कहना था कि विपक्षी पार्टियां दूसरी पार्टी के बारे में बयानबाजी करने के बजाय अपनी राजनीतिक स्थिति पर ध्यान दें।
राजनीति में यह भी बड़ा दिलचस्प दृश्य है—हर पार्टी दूसरी पार्टी को कमजोर बताती है और उसी समय उसकी बढ़ती ताकत पर सबसे ज्यादा चर्चा भी करती है।
किसकी ताकत कितनी है, इसका असली फैसला भाषणों से नहीं बल्कि चुनावी नतीजों से होता है।
संजय बालियान ने कहा—हजारों की भीड़ ने दिखा दी पकड़
डॉ. संजीव बालियान ने सम्मेलन में मौजूद हजारों कार्यकर्ताओं का जिक्र करते हुए कहा कि इतनी बड़ी संख्या में लोगों का पहुंचना रालोद और मंत्री अनिल कुमार की क्षेत्र में मजबूत पकड़ का संकेत है।
उन्होंने आयोजन की सफलता के लिए अनिल कुमार को बधाई दी।
यह राजनीतिक कार्यक्रम के लिए आयोजकों के लिहाज से निश्चित रूप से उत्साह बढ़ाने वाला संदेश था।
और अगर मंच पर बैठे पूर्व केंद्रीय मंत्री खुद आयोजन की भीड़ की तारीफ कर दें, तो आयोजक के लिए इससे बेहतर ‘फीडबैक कार्ड’ शायद ही कोई हो।
भाजपा के कई नेता नहीं दिखे, लेकिन गठबंधन ‘मजबूत’ बताया गया
यहीं इस पूरे कार्यक्रम का सबसे दिलचस्प राजनीतिक विरोधाभास सामने आया।
मंच से बार-बार भाजपा और रालोद गठबंधन की मजबूती की बात हुई, लेकिन कुछ भाजपा नेताओं की अनुपस्थिति को लेकर सवाल भी उठते रहे।
गठबंधन की मजबूती का आकलन केवल मंच पर मौजूद नेताओं से नहीं होता। लेकिन राजनीतिक कार्यक्रमों में उपस्थिति और अनुपस्थिति दोनों ही अपने-अपने संदेश लेकर आती हैं।
फिलहाल आयोजकों ने गैरमौजूद नेताओं की अनुपस्थिति को किसी मतभेद से नहीं जोड़ा है।
इसलिए इसे राजनीतिक दरार का प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी।
लेकिन सवाल उठना और चर्चा होना—दोनों को रोकना राजनीति के किसी नेता के बस में भी नहीं होता।
पूर्व मंत्री से लेकर संगठन के नेताओं तक लंबी सूची
कार्यक्रम में पूर्व मंत्री योगराज सिंह, पूर्व मंत्री धर्मवीर बालियान, रालोद जिलाध्यक्ष संजय राठी, पूर्व जिलाध्यक्ष संदीप मलिक, मंडल अध्यक्ष प्रभात तोमर और रालोद के वरिष्ठ नेता कृष्णपाल राठी समेत कई नेताओं ने विचार रखे।
चरथावल के प्रमुख अक्षय पुण्डीर, बघरा प्रमुख गौरव पंवार, सदर प्रमुख अमित चौधरी और तितावी गन्ना समिति चेयरमैन शंकर सिंह भोला सहित अन्य नेताओं की भी मौजूदगी रही।
इससे आयोजन का राजनीतिक और संगठनात्मक दायरा काफी बड़ा दिखाई दिया।
मंच के बाहर भी जुटी रही नेताओं की लंबी फौज
कार्यक्रम में पालिकाध्यक्ष मीनाक्षी स्वरूप, भाजपा नेता डॉ. पुरुषोत्तम, अभिषेक गुर्जर, रालोद नेता उमादत्त शर्मा, रामनिवास पाल, रोहाना गन्ना समिति चेयरमैन अनिल त्यागी, विपुल त्यागी बहेड़ी, श्यामपाल चेयरमैन, जिला सहकारी बैंक के डायरेक्टर हरेंद्र शर्मा, अर्जुन प्रधान, भाजपा नेता अजित राठी और विनय मित्तल सहित अनेक लोग मौजूद रहे।
हजारों कार्यकर्ताओं की मौजूदगी ने आयोजन को बड़ा राजनीतिक जमावड़ा बना दिया।
बैनर पर तस्वीरें भी कभी-कभी राजनीति बोलती हैं
राजनीतिक कार्यक्रमों में मंच, पोस्टर और बैनर सिर्फ सजावट नहीं होते।
किस नेता की तस्वीर कितनी बड़ी है, किसे बीच में जगह मिली है, कौन मुख्य अतिथि है और किसका नाम केवल सूची में है—इन सबको राजनीतिक संकेतों की तरह पढ़ा जाता है।
पुरकाजी के इस सम्मेलन में प्रमोद उटवाल की तस्वीर को लेकर मीडिया के सवाल ने इसी परंपरा को फिर सामने ला दिया।
हालांकि अनिल कुमार ने इसे किसी राजनीतिक विवाद से जोड़ने के बजाय व्यस्तता का कारण बताया।
इसलिए फिलहाल तस्वीर को लेकर पैदा हुई चर्चा को चर्चा ही मानना ज्यादा सुरक्षित है।
‘व्यस्त थे’—राजनीति का सबसे सुरक्षित जवाब?
किसी बड़े नेता के कार्यक्रम में न आने पर सबसे मुश्किल सवाल होता है—क्यों नहीं आए?
और सबसे आसान जवाब—‘शायद व्यस्त थे।’
यह जवाब इतना लचीला है कि इसमें नाराजगी भी नहीं, विवाद भी नहीं और भविष्य के लिए रास्ता भी खुला रहता है।
अनिल कुमार ने भी इसी तरह का जवाब दिया।
अब वास्तव में कौन व्यस्त था और कौन राजनीतिक रूप से व्यस्त था, यह अलग सवाल है।
गठबंधन में सब ठीक है—मंच से संदेश साफ
पूरे सम्मेलन का सार्वजनिक संदेश यही रहा कि रालोद और भाजपा का गठबंधन मजबूत है और विकास उसका मुख्य एजेंडा है।
संजीव बालियान और अनिल कुमार दोनों ने गठबंधन को लेकर सकारात्मक बातें कहीं।
इसलिए मंच से किसी भी प्रकार के मतभेद का संकेत नहीं दिया गया।
गैरमौजूद नेताओं को लेकर सवाल जरूर उठे, लेकिन आयोजकों की तरफ से उसे विवाद की शक्ल नहीं दी गई।
पुरकाजी में किसकी पकड़ कितनी? असली परीक्षा चुनाव में
कार्यकर्ता सम्मेलन में भीड़ जुटना किसी भी राजनीतिक दल के लिए उत्साह की बात है।
लेकिन चुनावी राजनीति में भीड़ और वोट के बीच सीधा गणित हमेशा नहीं बैठता।
सभा में आए कार्यकर्ता संगठन की ताकत दिखाते हैं, जबकि मतदान केंद्र पर पड़ने वाला वोट अंतिम राजनीतिक ताकत तय करता है।
पुरकाजी में रालोद की वास्तविक पकड़ और अनिल कुमार की लोकप्रियता का अंतिम मूल्यांकन चुनावी नतीजों में ही होगा।
संजीव बालियान की तारीफ भी बनी चर्चा का हिस्सा
संजीव बालियान ने अनिल कुमार की मेहनत और आयोजन की सफलता की खुलकर तारीफ की।
यह दृश्य इसलिए भी ध्यान खींचता है क्योंकि दोनों नेता अलग राजनीतिक पृष्ठभूमि से आते हुए अब गठबंधन के एक मंच पर दिखाई दे रहे हैं।
बालियान ने 2012 की राजनीति को याद करते हुए पुराने मतभेदों को पीछे छोड़कर साथ आने की बात कही।
राजनीति का यही तो कमाल है—कल की लड़ाई आज की साझेदारी बन सकती है और आज की साझेदारी कल की कहानी।
मंच पर विपक्ष के लिए संदेश, मंच के बाहर सवाल
कार्यक्रम में विपक्ष पर खूब हमले हुए।
अखिलेश यादव से लेकर विपक्षी दलों तक को सलाह दी गई कि वे रालोद की चिंता छोड़कर अपने राजनीतिक भविष्य पर ध्यान दें।
लेकिन पत्रकारों का ध्यान दूसरी तरफ भी था—गठबंधन के अपने नेताओं की मौजूदगी कैसी है?
यही वजह है कि सम्मेलन में दो अलग-अलग राजनीतिक कथाएं एक साथ चलती रहीं।
मंच से कहा गया—गठबंधन मजबूत है।
मीडिया ने पूछा—तो फिर कुछ चेहरे कहां हैं?
और मंत्री का जवाब—शायद व्यस्त थे।
सियासत इससे ज्यादा मनोरंजक और क्या होगी?
शक्ति प्रदर्शन सफल या राजनीतिक संदेश अधूरा?
भीड़ के लिहाज से कार्यक्रम आयोजकों के लिए सफल दिखाई दिया। संजीव बालियान की तारीफ ने भी आयोजन को अतिरिक्त राजनीतिक वजन दिया।
लेकिन भाजपा के कुछ प्रमुख चेहरों की गैरमौजूदगी ने इस शक्ति प्रदर्शन पर एक छोटा-सा सवालिया निशान जरूर लगा दिया।
यह निशान दरार का प्रमाण है या केवल संयोग—यह फिलहाल कहना जल्दबाजी होगी।
राजनीति में असली संकेत समय देता है।
रालोद के लिए पुरकाजी क्यों महत्वपूर्ण है?
पुरकाजी क्षेत्र पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां किसान, ग्रामीण मतदाता, स्थानीय संगठन और क्षेत्रीय राजनीतिक समीकरण चुनावी परिणामों को प्रभावित करते हैं।
रालोद की राजनीति का आधार भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मजबूत संगठन और किसान-युवा केंद्रित राजनीति से जुड़ा रहा है।
ऐसे में पुरकाजी में बड़ा कार्यकर्ता सम्मेलन आयोजित करना संगठन को सक्रिय करने और आगामी राजनीतिक लड़ाई के लिए कार्यकर्ताओं में उत्साह भरने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है।
अब अगला सवाल—भीड़ वोट में बदलेगी?
सभा में हजारों कार्यकर्ताओं की मौजूदगी निश्चित रूप से संगठन के लिए उत्साहजनक है।
लेकिन राजनीतिक दलों के लिए असली चुनौती यही होती है कि सभा की भीड़ को बूथ तक कैसे पहुंचाया जाए।
कार्यकर्ता सम्मेलन में तालियां बजाना आसान है, लेकिन चुनाव के दिन मतदाता को मतदान केंद्र तक लाना संगठन की असली परीक्षा होती है।
रालोद और उसके सहयोगी दलों के सामने भी यही चुनौती रहेगी।
फिलहाल मंच पर एकता, बैनर पर सवाल और राजनीति में मुस्कान
पुरकाजी का यह सम्मेलन कई संदेश छोड़ गया।
अनिल कुमार ने अपनी राजनीतिक पकड़ और विकास कार्यों को सामने रखा। संजीव बालियान ने उनकी मेहनत और भीड़ की तारीफ की। रालोद-भाजपा गठबंधन को मजबूत बताया गया। विपक्ष पर जमकर निशाना साधा गया।
लेकिन इसी बीच कुछ भाजपा नेताओं की अनुपस्थिति, खासकर प्रमोद उटवाल की तस्वीर और गैरमौजूदगी को लेकर सवाल भी उठे।
मंत्री ने जवाब दे दिया—‘फोन किया था, शायद व्यस्त थे।’
अब राजनीति में कभी-कभी सबसे दिलचस्प कहानी वही होती है जो कही नहीं जाती।
और मुजफ्फरनगर की सियासत में फिलहाल कहानी यही है—मंच पर गठबंधन की मजबूती का ऐलान हुआ, सामने हजारों कार्यकर्ताओं की भीड़ थी, संजीव बालियान ने तारीफ के पुल बांधे… लेकिन कुछ खाली कुर्सियों ने पत्रकारों को अपना काम करने का मौका जरूर दे दिया।
पुरकाजी के रालोद कार्यकर्ता सम्मेलन ने भीड़ और भाषणों के जरिए अनिल कुमार की राजनीतिक ताकत का संदेश देने की कोशिश की, जबकि संजीव बालियान ने भी आयोजन और मंत्री की मेहनत की खुलकर तारीफ की। मंच से रालोद-भाजपा गठबंधन को मजबूत बताया गया और विपक्ष पर निशाना साधा गया। दूसरी ओर कुछ भाजपा नेताओं की गैरमौजूदगी, खासकर पूर्व विधायक प्रमोद उटवाल की तस्वीर बैनर पर न होने को लेकर मीडिया के सवालों ने कार्यक्रम में थोड़ा सियासी तड़का जरूर लगा दिया। अनिल कुमार ने उनकी गैरमौजूदगी को व्यस्तता से जोड़कर जवाब दिया। फिलहाल किसी राजनीतिक मतभेद की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए तस्वीर साफ होने से पहले निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी—लेकिन मुजफ्फरनगर की राजनीति में इतनी भीड़ के बाद खाली कुर्सियों पर चर्चा होना भी अपने आप में एक अलग ‘सियासी खबर’ जरूर बन गई है।
