यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासनिक गलियों में आज तीन किस्से काफी चर्चा में रहे। चाहे-अनचाहे आखिर ये बाहर आ ही जाते हैं। इन्हें रोकने की हर कोशिश नाकाम होती है। आज की कड़ी में ‘परछाईं बनने का इनाम’ की कहानी। इसके अलावा ‘साइडलाइन रहने का साइड इफेक्ट’ और ‘मुख्यालय का दबदबा खत्म’ के किस्से भी चर्चा में रहे। आगे पढ़ें, नई कानाफूसी…
परछाईं बनने का इनाम
भगवा दल की नई टीम में एक बार फिर चहेतों की चांदी रही। लेकिन सबसे अधिक चर्चा उस पदाधिकारी की दोबारा ताजपोशी की हो रही है, जो मुखिया की परछाई बन कर घूम रहे थे। ताज्जुब तो यह है कि निर्णायक मंडल के जो जिम्मेदार इस पदाधिकारी की कार्यशैली और छवि को लेकर सवाल उठा रहे थे, उनकी ही सिफारिश पर इन्हें दोबारा वही पद सौंपा गया है, जिसपर ये पिछली टीम में भी काबिज थे। ऐसे में चर्चा यही है कि परछाईं बनने का ही इनाम दिया गया है।
साइडलाइन रहने का साइड इफेक्ट
लंबे समय से साइड लाइन पड़े एक साहब का धैर्य अब जवाब देने लगा है। लिहाजा वो बात-बात में अपना आपा खो दे रहे हैं। सूबे में सहकार को मजबूत करने वाले महकमे में तैनात साहब के इस व्यवहार से मातहत भी परेशान हैं। दरअसल 2017 से सत्ता परिवर्तन के बाद साहब को कुछ समय के लिए कलेक्टरी मिली तो वे आसमान छूने लगे। उनकी ख्याति ऐसी फैली कि उन्हें तत्काल शासन में बिठा दिया गया। तब से उन्होंने खूब प्रयास किए लेकिन किसी ने नहीं सुनी। ऐसे में साहब अब अपनी पूरी खीझ मातहतों पर ही उतारते हैं।
मुख्यालय का दबदबा खत्म
सियासत में उतरे डॉक्टरों को इस बार चौकाने वाले नतीजे मिले हैं। लंबे समय तक रहा मुख्यालय का दबदबा खत्म हो गया है। चुनाव परिणाम के बाद चर्चा ए आम है कि असली इम्तिहान तो अब शुरू हुआ है। देखना यह होगा कि मैदान वाले अपने हक की लड़ाई में कामयाब होते हैं अथवा फेल हो जाते हैं। मुख्यालय के बंद कमरे में गुणा गणित फेल होने का असर संगठन की सियासत पर पड़ता है अथवा नहीं। मुख्यालय में चर्चा सरेआम रही कि सेवानिवृत्ति से पहले ही मुख्यालय वाले पटखनी खा गए हैं।
