इटावा। सत्र न्यायाधीश ने एक महिला की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी। उन्होंने अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के 29 मई 2026 के आदेश को सही ठहराया। यह मामला बीएनएसएस की धारा 173(4) के तहत प्राथमिकी दर्ज कराने के आवेदन से संबंधित था।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि विपक्षी पक्ष ने साजिश के तहत उसके नाबालिग पुत्र को फंसाया। पुत्र घर से करीब पांच लाख रुपये के सोने-चांदी के जेवरात और एक लाख रुपये नकद लेकर चला गया था। इसके बाद विपक्षी पक्ष ने कथित रूप से जबरन वसूली कर 11 लाख रुपये या दो बीघा जमीन की मांग की। उन्होंने परिवार को धमकियां भी दी थीं। पुलिस रिपोर्ट के अनुसार, याचिकाकर्ता के पति और विपक्षी सिकंदराबाद की एक फैक्टरी में काम करते हैं। 16 अप्रैल 2026 को थाना सिकंदराबाद, जनपद बुलंदशहर में एक लड़की को ले जाने के संबंध में जीडी दर्ज हुई थी। दोनों के बरामद होने के बाद पक्षों के बीच एक समझौता हुआ। इसमें याचिकाकर्ता के पति ने 11 लाख रुपये देने पर सहमति जताई थी। सत्र न्यायाधीश ने पाया कि पूरा घटनाक्रम थाना सिकंदराबाद, जनपद बुलंदशहर क्षेत्र का है।
न्यायाधीश ने कहा कि केवल याचिकाकर्ता के इटावा निवासी होने से इटावा की अदालत को क्षेत्राधिकार नहीं मिलता। यह तथ्य भी सामने आया कि याचिकाकर्ता ने लड़की के गायब होने की जीडी दर्ज होने की जानकारी छिपाई थी। दोनों पक्षों के बीच पहले ही समझौता हो चुका था। इन तथ्यों के आधार पर इटावा की अदालत का क्षेत्राधिकार नहीं बनता।
न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि आवेदन में धमकी दिए जाने की तिथि, समय और स्थान जैसे आवश्यक विवरण नहीं थे। लगाए गए आरोप अस्पष्ट प्रतीत होते हैं। अदालत के अनुसार, यह आवेदन विपक्षी पक्ष की कार्रवाई के जवाब में दबाव बनाने के उद्देश्य से दायर किया गया था। इसलिए मजिस्ट्रेट द्वारा आवेदन निरस्त करने के आदेश में कोई अवैधता नहीं पाई गई। इन्हीं आधारों पर पुनरीक्षण याचिका को निराधार मानकर खारिज कर दिया गया।
