जसवंतनगर। ऐतिहासिक मैदानी रामलीला में धीरज पाठक करीब दो दशक से रावण का किरदार निभा रहे हैं। उनके लिए यह भूमिका केवल अभिनय नहीं, बल्कि गहरी आस्था से जुड़ा अनुभव है। वह प्रतिदिन भगवान श्रीराम की पूजा करते हैं और युद्ध लीला शुरू होने से पहले भी उनका नाम लेते हैं।

धीरज पाठक कस्बे के जैन मोहल्ला निवासी हैं। वह भारतीय स्टेट बैंक, इटावा में कार्यरत हैं। उनके पिता दिवंगत विपिन बिहारी पाठक ने करीब तीन दशक तक रामलीला में रावण का किरदार निभाया था। वर्ष 1996 में पिता के निधन के बाद धीरज ने वर्ष 2007 में यह महत्वपूर्ण विरासत संभाली। तब से वह लगातार इस भूमिका को निभा रहे हैं।

धीरज बताते हैं कि रामलीला में पात्रों का चयन आसानी से नहीं होता है। विभिन्न किरदारों के लिए कलाकारों में कड़ी होड़ रहती है। उन्हें पात्रता के साथ चयन प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। रावण की भूमिका मिलने पर उन्हें खुशी के साथ एक अलग तरह की अनुभूति होती है।

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आस्था और भक्ति का अनुभव

भगवान श्रीराम से युद्ध का दृश्य धीरज के लिए सबसे खास होता है। उस समय उनके मन में असीम शक्ति का एहसास होता है। उन्हें ऐसा लगता है जैसे वह साक्षात नारायण से युद्ध कर रहे हों। इसी दौरान श्रीराम के प्रति उनकी भक्ति की भावना और भी प्रबल हो जाती है।

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पिता की विरासत और श्रीराम की भक्ति

धीरज के मुताबिक, रामलीला का समय आते ही उनके भीतर रावण का किरदार निभाने की इच्छा स्वत: जाग उठती है। उनके लिए यह पिता से मिली विरासत को आगे बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण अवसर है। साथ ही यह उन्हें भगवान श्रीराम की भक्ति से भी गहराई से जोड़ता है। यह उनके जीवन का एक अभिन्न हिस्सा बन गया है।

फोटो 29::::धीरज।

फोटो 29::::धीरज।



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