– स्मृति में पार्क और सेनानियों की प्रतिमाएं स्थापित करने की है मांग
बालादीन राठौर
गरौठा। आजादी के आंदोलन में गरौठा तहसील का छोटा सा गांव सिमरधा क्रांतिकारियों की राजधानी बन गया था। जेल की तमाम यातनाएं सहने के बाद भी यहां के क्रांतिकारियों ने हार नहीं मानी थी। क्रांतिकारियों ने अपने हौसले के बूते अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे। स्थानीय लोगों की ओर से सिमरधा में क्रांतिकारियों की प्रतिमाएं स्थापित करने और उनकी स्मृति में पार्क स्थापित करने की मांग की जा रही है।
झांसी की गरौठा तहसील का एक गुमनाम सा गांव सिमरधा आजादी के आंदोलन के दौरान क्रांतिकारियों की गतिविधियों का केंद्र बन गया था। यहां होने वाली गुप्त बैठकों में क्रांतिकारी पं. परमानंद, लक्ष्मणराव कदम, दीवान शत्रुघ्न सिंह मगरोठ, श्रीपत सहाय लोधी ज़राखर, भगवानदास सक्सेना ब्यारजो आदि लगातार शामिल होते थे।
सन 1941 में यहां के लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ खुली बगावत कर दी थी, जिससे यह गांव अंग्रेजों की नजर में चढ़ गया था। सिमरधा के काशीप्रसाद द्विवेदी, झुंडन लाल चौबे, मुन्नीलाल मिश्रा, सीताराम त्रिपाठी, शालिग्राम तिवारी, गेंदनलाल पटेरिया, बैजनाथ तिवारी, रामसेवक सोनी, स्वामीप्रसाद लोधी, मगन अहिरवार, हरचरण लोधी, धनु बरेदी, खड़ौरा से तीर्थराज, सुंदरलाल मिश्रा, परशुराम लुहार, मूलचंद्र लुहार, ढिपकई से रामसेवक रिछारिया, विद्याधर त्रिपाठी, रामसुमरन मिश्रा, ठाकुर बाबू सिंह, रमपुरा से राजाराम रावत, गुढ़ा से प्रभुदयाल को छह महीने की जेल कर दी गई। लेकिन, जेल से छूटने के बाद भी आजादी के यह मतवाले पीछे नहीं हटे थे और भारत छोड़ो आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। उग्र प्रदर्शन करने पर उन्हें एक वर्ष का कठोर कारावास कर दिया गया था। इसी बीच सीताराम त्रिपाठी ने जेल में ही आमरण अनशन शुरू कर दिया था। हालत बिगड़ने पर उन्हें जेल से बाहर फेंक दिया गया था।
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‘न पाई, न भाई’ का दिया था नारा
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों पर जबरन युद्ध टैक्स (लड़ाई चंदा) थोप दिया था। इसके विरोध में सिमरधा के लोगों ने न पाई (पैसा), न भाई (सैनिक) का नारा दिया था। इससे गुस्साए अंग्रेज सिपाहियों ने सेनानियों को नजरबंद कर दिया था। इतना ही नहीं, ग्रामवासियों को लाठी व कोड़ों से बर्बरता से पीटा था। इसमें महिलाएं व बच्चे सभी लहूलुहान हो गए थे। इस निर्मम पिटाई से आहत श्रीपत सहाय तिवारी, लाडले दादा, खलबल पंत आदि स्वराज प्रेमी अंग्रेज सिपाहियों से भिड़ गए थे। इनके साहस को देख कई ग्रामवासियों ने भी लाठियां लेकर अंग्रेज सिपाहियों को पीटना शुरू कर दिया। इस घटना की गूंज महात्मा गांधी तक पहुंची थी। उन्होंने शाबाशी भरा पत्र ग्रामवासियों को लिखा था और आजादी मिलने तक संघर्ष जारी रखने का आह्वान किया था। आंदोलन में शहीद हुए सेनानियों को प्रतिवर्ष 11 जनवरी को याद किया जाता है।
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आजादी के आंदोलन में सिमरधा के सेनानियों को महत्वपूर्ण योगदान रहा है। ग्रामवासियों पर हुए बर्बर लाठीचार्ज की याद अब भी भावुक कर देती हैं। लेकिन, सालों बीत जाने के बाद भी शासन की ओर से सेनानियों की याद में पार्क व प्रतिमा स्थापित नहीं की गई। – श्रीप्रकाश मिश्रा, पूर्व प्रधान
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स्वतंत्रता के संग्राम में सिमरधा के सेनानियों को योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता। उनका नाम इतिहास में अमर है। सेनानियों ने अपने त्याग और बलिदान से अमिट छाप छोटी थी। गांव में जनप्रतिनिधियों की ओर से तमाम विकास कार्य कराए गए हैं।
– नरेंद्र सिंह राजपूत, ग्राम प्रधान सिमरधा
