इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 38 साल पहले हत्या में उम्रकैद की सजा पाए आठ में से जीवित बचे दो आरोपियों को बेगुनाह मानते हुए बरी कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि महज घटनास्थल पर मौजूदगी व नामजदगी के आधार पर किसी को दूसरे व्यक्ति के कृत्य के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इसके लिए यह साबित किया जाना जरूरी है कि आरोपी ने अन्य आरोपियों के साथ मिलकर घटना को अंजाम दिया था।
इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति सलिल कुमार राय, न्यायमूर्ति पदम नारायण मिश्रा की खंडपीठ ने सुरेश व सात अन्य की ओर से दाखिल आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए सत्र अदालत की ओर से सुनाई गई सजा रद्द कर दी। मामला मेरठ के कंकरखेड़ा थाना क्षेत्र का है। अभियोजन के मुताबिक 1988 में रंजिश को लेकर ओमपाल सिंह पर लाठी, भाला, फावड़ा और गंडासा से हमला किया गया था। इससे उनकी मौत हो गई थी। मामले में सुरेश, देवेंद्र, हरेंद्र, नागेंद्र, जुगेंद्र, रामधन, जयपाल और रवींद्र को नामजद किया गया।
सत्र अदालत ने सभी को गैरकानूनी जमाव के सदस्य मानते हुए इन्हें हत्या का दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ सभी ने हाईकोर्ट का रुख किया। अपील के दौरान नागेंद्र और जुगेंद्र को छोड़ बाकी छह की मौत हो गई। नागेंद्र और जुगेंद्र की अपील पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने पाया कि एफआईआर में दोनों के खिलाफ किसी विशेष भूमिका या हथियार का जिक्र नहीं था। अभियोजन के गवाह भी मुकर गए। घायल गवाह भी हमलावरों की पहचान करने में विफल रहे।
कोर्ट ने यह भी पाया कि घटना को लेकर दोनों पक्षों की ओर से क्रॉस केस दर्ज हुआ था। आरोपी पक्ष के कई लोगों को भी चोटें आई थीं। कोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने यह स्पष्ट निष्कर्ष नहीं दिया कि गैर कानूनी जमाव कैसे बना। उनका सामान्य उद्देश्य क्या था। सामूहिक आपराधिक दायित्व के सिद्धांत के मुताबिक आरोपियों की मौके पर मौजूदगी और उनके सामान्य उद्देश्य को विश्वसनीय साक्ष्य से साबित करना जरूरी है। केवल मौजूदगी या एफआईआर में नाम के आधार पर किसी को दूसरे व्यक्ति के कृत्य के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
