भारत स्वस्तिक यात्रा के सातवें दिन शुक्रवार को झांसी में रामकथा का आयोजन किया गया। मोरारी बापू ने झांसी के ऐतिहासिक किले में जाकर रानी लक्ष्मी बाई को पुष्प अर्पित कर राष्ट्रगान गाया। इसके बाद रामकथा करते हुए मोरारी बापू ने रानी लक्ष्मी बाई के अद्भुत शौर्य की प्रशंसा की। मोरारी बापू ने कहा कि शौर्य और धैर्य से भरपूर वीरांगना लक्ष्मीबाई की चेतना को वे प्रणाम करते हैं। उन्होंने दिन की रामकथा वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई के चरणों में समर्पित करते हुए भारतीय इतिहास में उनके असाधारण योगदान को याद किया।

बापू ने स्वस्तिक के गहरे अर्थ पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इसका एक अर्थ कल्याण है। उन्होंने स्वस्तिक के चतुष्पद यानी चार मार्गों को देव मार्ग, पितृ मार्ग, गुरु मार्ग और सूर्य मार्ग के रूप में समझाया और इन चारों मार्गों के आध्यात्मिक महत्त्व को रेखांकित किया। धर्मग्रंथों के व्यापक दार्शनिक संदेश को समझाते हुए बापू ने कहा कि सत् अर्थात सत्य की अभिव्यक्ति उपनिषदों में, सम् अर्थात समानता का भाव  भगवद्गीता में और सब अर्थात सभी को स्वीकार करने का भाव रामचरितमानस में मिलता है। उन्होंने कहा कि ये सिद्धांत सत्य, समानता और समावेशिता पर आधारित जीवन जीने का मार्ग प्रदान करते हैं। स्वस्तिक के केंद्रीय संदेश पर जोर देते हुए मोरारी बापू ने कहा कि केंद्र बिंदु स्वस्तिक का परब्रह्म परमात्मा है जिसका नाम राम है।यह विचार स्वस्तिक के आध्यात्मिक अर्थ के केंद्र में भगवान राम को स्थापित करता है और समस्त सृष्टि के कल्याण का संदेश देता है।

यह यात्रा भारत की आध्यात्मिक विरासत, पवित्र भूगोल और राष्ट्रीय पहचान को जोड़ने की व्यापक राष्ट्रीय दृष्टि के साथ आगे बढ़ रही है। आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चारों पीठों और ओंकारेश्वर को शामिल करने के साथ-साथ, जिसका इस दार्शनिक संत से गहरा आध्यात्मिक संबंध है। यात्रा में भारत के राष्ट्रगान में उल्लिखित प्रत्येक राज्य और नदी को भी समाहित किया जा रहा है। सिंधु क्षेत्र के वर्तमान भारतीय सीमाओं से बाहर होने के कारण, भागा सीमा पर रामकथा का आयोजन इस व्यापक राष्ट्रीय दृष्टि में विशेष महत्त्व रखता है।

हम्पी में तुंगभद्रा से लेकर नर्मदा तट पर स्थित ओंकारेश्वर और झांसी तक यात्रा के विभिन्न पड़ाव भारत की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत के विविध आयाम प्रस्तुत करते हैं। यह यात्रा छत्रपति शिवाजी महाराज और रानी लक्ष्मीबाई जैसी विभूतियों को भी स्मरण करती है जिनका जीवन आज भी साहस, स्वाभिमान और राष्ट्रसेवा की प्रेरणा देता है।

झांसी के पड़ाव पर बोलते हुए मदन पालीवाल, (चेयरमैन, संतकृपा सनातन संस्थान) ने कहा कि भारत के इतिहास में झांसी का विशेष स्थान है क्योंकि यह हमें रानी लक्ष्मीबाई के असाधारण साहस और बलिदान की याद दिलाती है। उनकी स्मृति को रामकथा समर्पित करके मोरारी बापू ने भारत की विरासत के आध्यात्मिक और ऐतिहासिक पहलुओं को एक साथ जोड़ा है। यह यात्रा देश को एक सूत्र में बांधने वाले मूल्यों को सुदृढ़ करने और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करने का प्रयास है। झांसी में आयोजित रामकथा यात्रा के प्रथम चरण का हिस्सा थी। इस चरण का शुभारंभ 10 अक्टूबर को कन्याकुमारी से हुआ था, जिसका समापन 23 अक्टूबर को केदारनाथ में होगा।



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