Muzaffarnagar/जानसठ मोहर्रम की छठी तारीख पर क्षेत्र के कैथोड़ा गांव में शिया समुदाय द्वारा पारंपरिक जुलूस-ए-अजा अत्यंत श्रद्धा, अनुशासन और धार्मिक भावनाओं के साथ निकाला गया। जुलूस के दौरान पूरा क्षेत्र “या हुसैन” की सदाओं से गूंज उठा और कर्बला के शहीदों की याद में अकीदतमंदों ने गम और अकीदत का इजहार किया। जुलूस में शामिल सोगवारों ने जंजीरों और हाथों से मातम करते हुए हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों की कुर्बानियों को याद किया।

मोहर्रम का महीना इस्लामी इतिहास में विशेष महत्व रखता है। यह केवल शोक का समय नहीं बल्कि सत्य, न्याय, इंसानियत और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष के संदेश को याद करने का अवसर भी माना जाता है। इसी भावना के साथ कैथोड़ा गांव में आयोजित जुलूस-ए-अजा में बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लिया।


मजलिस में कर्बला की कुर्बानियों का किया गया विस्तृत जिक्र

जुलूस शुरू होने से पूर्व बड़े इमामबाड़े में आयोजित मजलिस को मौलाना अथर काजमी ने संबोधित किया। उन्होंने कर्बला की ऐतिहासिक घटना का उल्लेख करते हुए बताया कि हजरत इमाम हुसैन ने सत्ता या व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि इंसाफ, सत्य और इस्लामी मूल्यों की रक्षा के लिए अपनी जान की कुर्बानी दी थी।

मौलाना ने कहा कि कर्बला का संदेश केवल एक समुदाय या मजहब तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरी मानवता के लिए सत्य और अन्याय के खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा देता है। उन्होंने हजरत अली, इमाम हुसैन और कर्बला में शहीद हुए 72 साथियों की कुर्बानियों को याद करते हुए कहा कि इतिहास में यह घटना आज भी साहस, सब्र और सिद्धांतों के प्रति समर्पण की मिसाल मानी जाती है।

उन्होंने उपस्थित अकीदतमंदों से अपील की कि मोहर्रम के संदेश को अपने जीवन में अपनाएं और समाज में प्रेम, भाईचारा और इंसाफ की भावना को मजबूत करें।


नौहाख्वानी ने भावुक किया माहौल, नम हुईं अकीदतमंदों की आंखें

मजलिस के बाद शुरू हुए जुलूस में नौहाख्वानी का विशेष आयोजन भी किया गया। हसीन मिया और निहाल अब्बास ने दर्दभरे अंदाज में नौहे पढ़े, जिन्हें सुनकर मौजूद सोगवार भावुक हो उठे। नौहों के दौरान कर्बला की यादें ताजा हो गईं और कई लोगों की आंखें नम दिखाई दीं।

नौहाख्वानों की आवाज में दर्द और अकीदत की गहराई साफ झलक रही थी। उनके द्वारा प्रस्तुत नौहों ने पूरे वातावरण को गमगीन बना दिया। जुलूस में शामिल लोग लगातार इमाम हुसैन और कर्बला के शहीदों को याद करते रहे।


गांव के प्रमुख मार्गों से होकर गुजरा जुलूस, जगह-जगह हुआ इस्तकबाल

जुलूस बड़े इमामबाड़े से प्रारंभ होकर गांव के विभिन्न प्रमुख मार्गों और धार्मिक स्थलों से होकर गुजरा। निर्धारित मार्ग के अनुसार जुलूस गांव के विभिन्न इमामबाड़ों, ताजिया चौक, थावर वाली मस्जिद, कोटला, दरबार मोहल्ला, खटीकान, पड़ाव चौक तथा मुस्तर्क चौक से होता हुआ आगे बढ़ा।

मार्ग के दौरान अनेक स्थानों पर लोगों ने श्रद्धापूर्वक जुलूस का स्वागत किया। कई जगहों पर अकीदतमंदों ने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कर्बला के शहीदों को याद किया। पूरे रास्ते धार्मिक अनुशासन और शांतिपूर्ण वातावरण देखने को मिला।

स्थानीय लोगों ने बताया कि कैथोड़ा गांव में मोहर्रम के अवसर पर निकलने वाले जुलूसों की एक पुरानी परंपरा रही है, जिसमें क्षेत्र के लोग बड़ी संख्या में भाग लेते हैं।


पचदरा इमामबाड़े पर हुआ पुरज़ोर मातम

जुलूस जब पचदरा इमामबाड़े पहुंचा तो वहां शिया समुदाय के सोगवारों ने जंजीरों और हाथों से मातम किया। इस दौरान पूरा वातावरण गम और श्रद्धा से भर गया। उपस्थित लोगों ने कर्बला के शहीदों को याद करते हुए उनकी कुर्बानियों को सलाम पेश किया।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मोहर्रम के दिनों में किए जाने वाले मातम को इमाम हुसैन और उनके साथियों के प्रति अकीदत और सम्मान की अभिव्यक्ति माना जाता है। जुलूस में शामिल लोगों ने पूरी श्रद्धा और अनुशासन के साथ इस परंपरा का निर्वहन किया।


खलीफा वाले इमामबाड़े पर संपन्न हुआ जुलूस

पचदरा इमामबाड़े के बाद जुलूस शाहीन रजा के इमामबाड़े पहुंचा, जहां भी श्रद्धालुओं ने अकीदत पेश की। इसके बाद निर्धारित मार्ग से होता हुआ जुलूस खलीफा वाले इमामबाड़े पहुंचा, जहां धार्मिक रस्मों के साथ कार्यक्रम का समापन किया गया।

समापन के दौरान लोगों ने कर्बला के शहीदों के लिए दुआ की और मानवता, शांति तथा भाईचारे की कामना की। उपस्थित लोगों ने मोहर्रम के संदेश को समाज तक पहुंचाने का संकल्प भी लिया।


बड़ी संख्या में मौजूद रहे अकीदतमंद, युवाओं की भी रही सक्रिय भागीदारी

जुलूस में मशरूर इकबाल, हाजी मुजाबिर हुसैन जैदी, गुलाम हैदर, अजमल जैदी, नीलू जैदी, मीशम जैदी उर्फ मेराज रजा, अली जामिन जैदी, शादाब अली, शबाब आलम, जफर हुसैन, अली किशवर, रौनक मिया, जगनफर अली, अली रजा और हाजी अथर अब्बास सहित बड़ी संख्या में अकीदतमंद शामिल रहे।

विशेष बात यह रही कि कार्यक्रम में युवाओं की भागीदारी भी उल्लेखनीय रही। युवाओं ने जुलूस की व्यवस्थाओं और अनुशासन बनाए रखने में सहयोग किया। धार्मिक आयोजनों में युवाओं की सक्रिय उपस्थिति को समुदाय के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।


सुरक्षा व्यवस्था रही चाक-चौबंद, पुलिस बल पूरे रूट पर रहा तैनात

मोहर्रम के मद्देनजर प्रशासन और पुलिस विभाग पूरी तरह सतर्क नजर आया। जुलूस मार्ग पर सुरक्षा व्यवस्था के व्यापक इंतजाम किए गए थे ताकि आयोजन शांतिपूर्ण और व्यवस्थित ढंग से संपन्न हो सके।

थाना प्रभारी निरीक्षक राजीव शर्मा, इंस्पेक्टर क्राइम सुनील कुमार मिश्रा, एसआई महेन्दर गौतम, कस्बा इंचार्ज ओमेन्दर सिंह तथा कैथोड़ा चौकी प्रभारी भारी पुलिस बल के साथ पूरे जुलूस मार्ग पर लगातार निगरानी बनाए रहे। पुलिस अधिकारियों ने आयोजकों के साथ समन्वय बनाकर व्यवस्थाओं को सुचारु रखा।

प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार पूरे आयोजन के दौरान कहीं से भी किसी प्रकार की अप्रिय घटना की सूचना नहीं मिली और जुलूस पूरी तरह शांतिपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ।


मोहर्रम का संदेश: सत्य, इंसाफ और कुर्बानी की अमर मिसाल

मोहर्रम केवल एक धार्मिक अवसर नहीं बल्कि इतिहास के उस अध्याय की याद है, जिसने इंसाफ और सत्य के लिए संघर्ष की नई परिभाषा दी। कर्बला की घटना आज भी दुनिया भर में साहस, त्याग और सिद्धांतों के प्रति अडिग रहने की प्रेरणा के रूप में याद की जाती है।

कैथोड़ा में निकला जुलूस-ए-अजा भी इसी संदेश को जीवंत करता नजर आया, जहां लोगों ने गम के साथ-साथ इंसानियत, सब्र और भाईचारे के मूल्यों को याद किया। पूरे आयोजन में धार्मिक अनुशासन, सामाजिक सौहार्द और आपसी सम्मान का वातावरण देखने को मिला।

कैथोड़ा गांव में मोहर्रम की छठी तारीख पर निकला जुलूस-ए-अजा श्रद्धा, अनुशासन और अकीदत का प्रतीक बनकर सामने आया। ‘या हुसैन’ की सदाओं, नौहाख्वानी और मातम के बीच कर्बला के शहीदों को याद किया गया। बड़ी संख्या में शामिल अकीदतमंदों ने इमाम हुसैन की कुर्बानी को सलाम पेश करते हुए सत्य, इंसाफ और मानवता के संदेश को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया। प्रशासन और पुलिस की सतर्क व्यवस्था के बीच पूरा आयोजन शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ, जिसने क्षेत्र में सामाजिक सौहार्द और धार्मिक सम्मान की एक सकारात्मक तस्वीर प्रस्तुत की।

 



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