यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासनिक गलियों में आज तीन किस्से काफी चर्चा में रहे। चाहे-अनचाहे आखिर ये बाहर आ ही जाते हैं। इन्हें रोकने की हर कोशिश नाकाम होती है। आज की कड़ी में ‘साहब के कमरे पे नजर’ की कहानी। इसके अलावा ‘आग से बढ़ी धुकधुकी’ और ‘खाली जमीन पर निवेश की वाहवाही’ के किस्से भी चर्चा में रहे। आगे पढ़ें, नई कानाफूसी…
साहब के कमरे पे नजर
प्रदेश के सरकारी विभागों में कुर्सी को लेकर खींचतान तो अक्सर देखने को मिली होगी लेकिन पढ़ाई-लिखाई वाले एक महकमें में इस समय एक साहब के कमरे पर किसी की नजर लग गई है। साहब ने बड़े चाव से अपना कमरा तैयार करवाया और उसमें कुछ ही दिन बैठे थे कि उनका तबादला हो गया। उनके जाने के बाद दूसरे अधिकारी को कमरा एलॉट हुआ। कुछ दिन बाद उनके हाथ से एक बड़ी कुर्सी तो फिसली ही, अब उनका भी कमरा किसी और को पसंद आ गया है। इसे लेकर विभाग में लोगों के बीच साहब के कमरे पर काफी चर्चा चल रही है।
आग से बढ़ी धुकधुकी
राजधानी में लगी आग ने ऊर्जा विभाग के अफसरों की धुकधुकी बढ़ा दी है। कुछ समय पहले राजधानी के एक होटल में आग लगी थी। अग्निकांड के दोषी अभियंताओं को चुपके से वरी कर दिया गया था। नए अग्निकांड के बाद उन अभियंताओं को एक बार फिर से डर सताने लगा है कि कहीं उनकी फाइल दोबारा न खुल जाए। ऐसे में वे मीडियाकर्मियों से टोह लेते नजर आए कि इसका असर कहीं पुरानी घटना पर ही तो नहीं पड़ेगा।
खाली जमीन पर निवेश की वाहवाही
सूबे में निवेश के नाम पर किसानों से जमीनें लेकर निवेशकों को रेवड़ी की तरह बांट दी गईं, लेकिन उन बनने वाली फैक्टि्रयां सिर्फ कागजों पर ही खड़ी हैं। ऐसे संबंधित महकमें के बड़े साहब ही इसपर सवाल खड़े कर रहे हैं। उनका सवाल है कि महज 10 प्रतिशत जमीनों पर ही फैक्टि्रयां लग पाई हैं, शेष जमीन खाली पड़ी हैं। इसके बावजूद लाखों करोड़ के भूमि पूजन समारोह की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं।
खास तौर से पश्चिमी यूपी के सबसे संपन्न जिले में फैक्टरियां लगाने की स्थिति काफी खराब है। वहीं, जमीन की व्यवस्था करने वाले प्राधिकरणों में ही अंदरखाने प्रतिस्पर्धा चल रही है कि कौन कितना आगे। अब प्राधिकरणों के साहब ही सवाल उठा रहे हैं कि पश्चिम के जिले में जमीनें तो रेवड़ियों की तरह बांट दी गईं लेकिन उनपर खेत ज्यादा और फैक्टरियां नाममात्र की हैं।
