अलीगढ़ की लाल डिग्गी स्थित 100 साल पुरानी निशात कोठी के विवाद में अपर सिविल जज कनिष्ठ प्रभाग कोर्ट संख्या-3 की न्यायाधीश महिमा सिंह ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) के पक्ष में फैसला सुनाया है। 29 साल तक चले इस केस में अदालत ने पूर्व कर्मचारी सखावत हुसैन के विधिक वारिसों के दावे को खारिज करते हुए संपत्ति पर से अपना कब्जा हटाने और हर्जाना अदा करने का आदेश दिया है। इस परिसर में पांच परिवार रहते हैं और करीब एक हजार वर्ग गज जमीन को लेकर विवाद चल रहा था।

यह वाद एएमयू के रजिस्ट्रार और फाइनेंस ऑफिसर के माध्यम से दायर किया गया था। वाद के अनुसार, लाल डिग्गी रोड स्थित निशात कोठी (मकान और भूमि सहित) की मूल स्वामिनी स्वर्गीय बीबी फातिमा बेगम थीं। उन्होंने 14 जुलाई 1926 को एक पंजीकृत बैनामा के जरिये इस संपत्ति को एएमयू को वक्फ (दान) कर दिया था, जिसके बाद एएमयू इस वक्फ संपत्ति का मुतवल्ली (प्रबंधक) बन गया। यह संपत्ति उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड, लखनऊ में भी पंजीकृत है।

यह संपत्ति यूनिवर्सिटी के तत्कालीन कर्मचारी स्वर्गीय सखावत हुसैन को उनके कार्यकाल के दौरान केयरटेकर के रूप में रहने के लिए दी गई थी। वर्ष 1992 में सखावत हुसैन को यूनिवर्सिटी ने बर्खास्त कर दिया था, जिसके बाद वे केयरटेकर भी नहीं रहे। यूनिवर्सिटी ने 29 दिसंबर 1997 को कानूनी नोटिस भेजकर उनका लाइसेंस समाप्त करते हुए 30 दिन के भीतर कब्जा हटाने के लिए कहा था लेकिन संपत्ति खाली नहीं की गई। इसके बाद यूनिवर्सिटी ने बेदखली और हर्जा इस्तेमाली की वसूली के लिए वाद दायर किया था।



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