इलाहाबाद हाईकोर्ट ने काशी राजपरिवार की संपत्तियों को लेकर चल रहे विवाद में वादी को अंतरिम स्टे देने से इनकार कर दिया है। न्यायमूर्ति अनिल कुमार दशम की एकलपीठ ने कहा कि जब अंतरिम निषेधाज्ञा की अर्जी में यह स्पष्ट ही नहीं किया गया कि किन विशिष्ट संपत्तियों के संबंध में राहत मांगी जा रही है, तब ऐसे अस्पष्ट आवेदन पर अंतरिम संरक्षण नहीं दिया जा सकता। अदालत ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को सही ठहराया जिसमें अंतरिम निषेधाज्ञा की मांग खारिज कर दी गई थी।

महाराज कुमारी विष्णुप्रिया की ओर से दायर संपत्ति बंटवारा और घोषणा संबंधी वाद से जुड़ा है। वादी का दावा है कि माता-पिता की छोड़ी गई संपत्तियों में उनका एक-चौथाई हिस्सा है। उन्होंने संपत्तियों के बंटवारे के साथ ही अनुसूची ‘जेड’ में वर्णित अपनी व्यक्तिगत संपत्तियों के शांतिपूर्ण उपयोग और कब्जे की सुरक्षा की भी मांग की थी। साथ ट्रायल कोर्ट की ओर से अंतरिम स्टे की मांग खारिज करने को हाईकोर्ट में चुनौती दी।

वहीं, डॉ. अनंत नारायण सिंह ने सिविल कोर्ट में वाद नहीं चलाने की मांग में दायर अर्जी खारिज होने को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने कहा कि वाद में अंतरिम निषेधाज्ञा के आवेदन में यह नहीं बताया गया कि राहत किन संपत्तियों के संबंध में मांगी जा रही है। आवेदन में केवल प्रतिवादियों को संपत्ति बेचने, हस्तांतरित करने अथवा कब्जे में हस्तक्षेप करने से रोकने की सामान्य प्रार्थना की गई है। कोर्ट ने कहा कि संबंधित संपत्ति का स्पष्ट विवरण देना जरूरी है। अस्पष्ट आवेदन अंतरिम राहत नहीं दी जा सकती।

इसके चलते ट्रायल कोर्ट की ओर से अंतरिम निषेधाज्ञा देने से इनकार करने के आदेश में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है। हाईकोर्ट ने पांच मार्च 2024 के आदेश को बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी। साथ ही 31 मई 2023 के आदेश को चुनौती देने वाली सिविल रिवीजन भी खारिज कर दी, जिससे ट्रायल कोर्ट के दोनों आदेश यथावत बने रहेंगे।



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *