इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बस्ती के एसपी से पूछा है कि मजिस्ट्रेट को अग्रिम जमानत का अधिकार कब से मिल गया। यह सवाल न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने रत्नेश कुमार उर्फ राजू शुक्ला की याचिका पर किया।

कोर्ट में पेश एसपी के हलफनामे में तर्क दिया गया कि कई आरोपियों की अग्रिम जमानत याचिकाएं मजिस्ट्रेट की अदालत में लंबित हैं। इस पर कोर्ट ने हैरानी जताई। कहा, जिले के शीर्ष पुलिस अधिकारी को यह नहीं पता कि मजिस्ट्रेट को अग्रिम जमानत देने का अधिकार नहीं है तो उनके कानूनी ज्ञान के बारे में जितना कम कहा जाए उतना बेहतर है।

खफा कोर्ट ने स्पष्टीकरण के साथ एसपी से 29 अप्रैल तक नया हलफनामा तलब किया है। इससे पहले सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि एसपी ने विवेचक को इस आधार पर निलंबित किया था कि उन्होंने बिना पर्याप्त सबूत जुटाए मजिस्ट्रेट से गैर-जमानती वारंट हासिल किया।

कोर्ट ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा था कि वारंट पुलिस के कहने पर नहीं, बल्कि मजिस्ट्रेट केस डायरी का गहन अध्ययन करने के बाद जारी करते हैं। एसपी की कार्रवाई को कोर्ट ने माना कि न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल उठाना न्यायिक हस्तक्षेप है। कोर्ट ने डिप्टी सीएम का नाम शामिल करने पर आपत्ति जताई थी।

इस पर कोर्ट ने एसपी से हलफनामा तलब किया था। इसके क्रम में पेश हलफनामे के अनुच्छेद-10 में कोर्ट ने पाया कि एसपी ने मजिस्ट्रेट की अदालत में अग्रिम जमानत लंबित होने की बात कही। इससे हैरान कोर्ट ने एसपी के कानूनी ज्ञान पर तल्ख टिप्पणी की। 



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