Accused doctors positions remain secure, questions raised over the investigation

केजीएमयू में धर्मांतरण का खेल।

लखनऊ। केजीएमयू में धर्मांतरण मामले में एसटीएफ की रिपोर्ट में आरोपों से घिरे डॉक्टरों पर कार्रवाई के नाम पर सिर्फ जांच कमेटी गठित कर दी गई है। गंभीर आरोपों के बावजूद संबंधित डॉक्टरों को उनके प्रशासनिक और विभागीय पदों से नहीं हटाया गया। ऐसे में जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं। आशंका जताई जा रही है कि अहम पदों पर बने रहने से आरोपी जांच को प्रभावित करने के साथ पीड़ितों और गवाहों पर दबाव बना सकते हैं।


शुक्रवार को कुलपति प्रो. सोनिया नित्यानंद की अध्यक्षता में हुई कार्य परिषद की बैठक में एसटीएफ की रिपोर्ट के आधार पर 13 डॉक्टरों के खिलाफ आगे की कार्रवाई के लिए अनुशासनात्मक कमेटी गठित करने का फैसला लिया गया। हालांकि, जांच पूरी होने तक आरोपी डॉक्टरों को पदों से हटाने पर कोई निर्णय नहीं हुआ। इस फैसले पर इसलिए भी सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि इससे पहले यूरोलॉजी विभाग में दवा घोटाले की जांच के दौरान विभागाध्यक्ष को पद से हटा दिया गया था। तब जांच प्रभावित होने की आशंका को इसकी वजह बताया गया था। ऐसे में धर्मांतरण जैसे गंभीर मामले में अलग मापदंड अपनाए जाने पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

कई अहम पदों पर तैनात हैं आरोपी

एसटीएफ की रिपोर्ट में नामजद प्रो. सुरेश बाबू पैथोलॉजी विभाग के अध्यक्ष होने के साथ कार्य परिषद के सदस्य भी हैं। उन पर पीड़िता को मानसिक रूप से विक्षिप्त बताकर आरोपी को बचाने और मामला दबाने का आरोप है। वहीं, डॉ. वाहिद अली पैथोलॉजी विभाग में लैब इंचार्ज हैं। उन पर लैब में नमाज और बैठकों के लिए जगह उपलब्ध कराने, एक हिंदू डॉक्टर को प्रताड़ित करने और डॉ. रमीज का समर्थन करने के आरोप हैं। इसके अलावा रिपोर्ट में नामजद अन्य डॉक्टर भी विभागीय और संस्थान के महत्वपूर्ण पदों पर तैनात हैं। ऐसे में जांच से जुड़े दस्तावेज, कर्मचारियों और संभावित गवाहों तक उनकी पहुंच जांच की निष्पक्षता को प्रभावित कर सकती है।



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