लखनऊ। करीब छह साल पहले सीमा विस्तार के बाद नगर निगम में 88 गांव और शामिल किए गए। यहां 10 हजार से अधिक गाय-भैंसें पाली जा रही हैं, लेकिन जमीन की कमी के कारण अभी तक एक भी कैटिल कॉलोनी नहीं बनाई जा सकी है। छह साल से इसके लिए सिर्फ कागजी कवायद हो रही है।
शहर के अंदर डेयरी चलाने पर हाईकोर्ट ने करीब 26 साल पहले रोक लगाई थी। आदेश के तहत डेयरियों को शहर से बाहर करना था। इसके लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाया गया लेकिन यह पूरी तरह सफल नहीं हुआ। हटने के बाद डेयरियां दोबारा शहर के अंदर आ गईं। इसका कारण है कि इनके हिसाब से कैटिल कॉलोनी नहीं बन सकी। सीमा विस्तार के बाद समस्या गहरा गई है।
विस्तारित क्षेत्र में कैटिल कॉलोनी न बनने से हाईकोर्ट ने अभी इलाके में कार्रवाई पर रोक के निर्देश दिए हैं। नगर निगम यहां सिर्फ छुट्टा पशु पकड़ता है। घरों के अंदर डेयरी से गाय-भैंसों को नहीं पकड़ा जाता है। पशु कल्याण अधिकारी डॉ. अभिनव वर्मा का कहना है कि विस्तारित इलाके की करीब 1200 डेयरियों में 10 हजार से अधिक पशु हैं। इनके लिए कैटिल कॉलोनी बनाई जानी है। यह काम एलडीए, आवास विकास और जिला प्रशासन को करना है।
…इसलिए नहीं हट पा रहीं डेयरियां
नगर निगम के पूर्व अधिकारी का कहना है कि अब तक डेयरी वालों को बेहतर विकल्प नहीं मिला है। 26 साल पहले जहां कैटिल कॉलोनियां बनाई गईं, वे स्थान उस समय के हिसाब से उपयुक्त नहीं थे। बालागंज की कैटिल कॉलोनी में हर बारिश में बाढ़ आ जाती थी। बंधा बनने से कुछ राहत हुई है। इसके अलावा जहां कैटिल कॉलोनियां बनाई गर्ईं उतनी दूर कोई दूध लेने नहीं जाता। होना यह चाहिए था कि हर कॉलोनी में पहले से व्यवस्था की जाती, जहां डेयरी का संचालन हो सकता था। इसके अलावा 26 साल पहले हाई कोर्ट के निर्देश पर डेयरियां तो चार हजार से ज्यादा हटाई गईं लेकिन जगह करीब डेढ़ हजार को ही उपलब्ध कराई गई।
दो गाय पाल सकते हैं, भैंस नहीं
नगर निगम से लाइसेंस लेने के बाद दो गाय ही शहर के अंदर पाल सकते हैं। भैंस पालने पर रोक है। गाय के लाइसेंस के लिए भी आवेदक को निगम की शर्तें पूरी करनी होती हैं। यदि पड़ोसी शिकायत करता है कि आपके गाय पालने से उसे परेशानी हो रही है तो लाइसेंस रद्द भी किया जा सकता है।
कोट
विस्तारित क्षेत्र के लिए कैटिल कॉलोनी बनाने के लिए अभी कार्यवाही चल रही है। डेयरियों की संख्या को देखते हुए अभी पुराने क्षेत्र के लिए भी और कैटिल कॉलोनी बनाने की जरूरत है। इसके लिए एलडीए, आवास विकास और जिला प्रशासन को पत्र भी लिखे गए हैं।
– अभिनव वर्मा, पशु कल्याण अधिकारी, नगर निगम
