Muzaffarnagar में आयोजित सामाजिक समरसता सम्मेलन में राष्ट्रीय लोकदल के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं केंद्रीय मंत्री Jayant Chaudhary सामाजिक एकता, किसान, युवा, रोजगार और विकास के मुद्दों पर विस्तार से बोले। जनता इंटर कॉलेज, मुस्तफाबाद पचेंडा में आयोजित सम्मेलन में जयंत चौधरी ने विपक्षी राजनीति पर भी तीखा हमला बोला और आरोप लगाया कि कुछ राजनीतिक दल तीन शब्दों के नारे के माध्यम से समाज के अलग-अलग वर्गों की पहचान तलाशकर विभाजन की राजनीति कर रहे हैं। यह टिप्पणी उन्होंने समाजवादी पार्टी के ‘पीडीए’ नारे के संदर्भ में की।
जयंत चौधरी ने अपने संबोधन में कहा कि सामाजिक बराबरी और समरसता आज की बड़ी जरूरत है। उनके मुताबिक समाज को जातिगत और सामाजिक खांचों में देखने के बजाय विभिन्न वर्गों के बीच संवाद और सहयोग को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि रालोद की राजनीति को किसान, युवा, रोजगार, शिक्षा, उद्यमिता और सामाजिक भाईचारे जैसे मुद्दों से जोड़कर आगे बढ़ाया जाना चाहिए।
मुजफ्फरनगर में हुआ यह सम्मेलन ऐसे समय में आयोजित किया गया, जब उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दलों की गतिविधियां तेज हो रही हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रालोद की राजनीतिक मौजूदगी के लिहाज से मुजफ्फरनगर लंबे समय से महत्वपूर्ण क्षेत्र रहा है। सम्मेलन में पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं, जनप्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं की मौजूदगी रही।
‘तीन शब्दों’ के नारे पर जयंत चौधरी का विपक्ष पर निशाना
सम्मेलन में जयंत चौधरी ने विपक्ष के ‘पीडीए’ नारे को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि तीन शब्दों के भीतर बिरादरियां तलाशकर समाज को अलग-अलग हिस्सों में बांटने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। उनके अनुसार राजनीतिक बहस का केंद्र केवल सामाजिक पहचान नहीं, बल्कि किसान, रोजगार, शिक्षा, कारोबार और विकास जैसे वास्तविक मुद्दे भी होने चाहिए।
उन्होंने कहा कि उनकी किसी व्यक्ति विशेष से व्यक्तिगत लड़ाई नहीं है, लेकिन जब किसी समाज या वर्ग को लेकर टिप्पणी की जाती है तो वह उसके खिलाफ आवाज उठाएंगे। इसी क्रम में उन्होंने समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष श्यामलाल पाल के एक कथित बयान का भी उल्लेख किया और चुनौती दी कि यदि किसी समाज को ‘गिरा हुआ’ कहा गया है तो उसका नाम स्पष्ट रूप से बताया जाए।
जयंत चौधरी ने यह भी कहा कि यदि रालोद का कोई प्रदेश अध्यक्ष किसी जाति या समाज पर इस तरह की टिप्पणी करता, तो वह पद पर नहीं रह सकता। उनका यह बयान सम्मेलन में मौजूद कार्यकर्ताओं के बीच पार्टी की सामाजिक समरसता संबंधी लाइन को रेखांकित करने के रूप में सामने आया।
‘व्यक्तिगत लड़ाई नहीं, समाज पर टिप्पणी होगी तो जवाब देंगे’
जयंत चौधरी ने अपने संबोधन में राजनीतिक विरोध और सामाजिक विवाद के बीच अंतर की बात भी रखी। उन्होंने कहा कि व्यक्तिगत राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन किसी समाज को लेकर टिप्पणी होने पर वह चुप नहीं रहेंगे। इस दौरान उन्होंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सामाजिक संरचना और विभिन्न समुदायों के बीच पारंपरिक संबंधों का भी उल्लेख किया।
उनके मुताबिक समाज में किसी एक वर्ग की ताकत से स्थायी विकास संभव नहीं है। अलग-अलग समुदायों, जातियों और सामाजिक समूहों के बीच संवाद तथा आर्थिक निर्भरता को समझना जरूरी है। उन्होंने कहा कि जब लोग एक-दूसरे के साथ बैठेंगे, बातचीत करेंगे और अपने आपसी संबंधों को समझेंगे, तभी सामाजिक दूरी कम होगी।
सामाजिक समरसता सम्मेलन में ‘सर्वसमाज’ पर जोर
रालोद के इस सम्मेलन का केंद्रीय विषय ही सामाजिक समरसता रहा। जयंत चौधरी ने स्पष्ट किया कि समरसता का मंच किसी एक जाति या वर्ग के लिए नहीं हो सकता। इसमें समाज के सभी वर्गों की भागीदारी जरूरी है।
उन्होंने संत रविदास, डॉ. भीमराव अंबेडकर और चौधरी चरण सिंह के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन महापुरुषों की विरासत को किसी एक सामाजिक समूह तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए।
जयंत चौधरी ने कहा कि भारत की विशेषता उसकी विविधता में है। अलग-अलग विचार, परंपराएं और सामाजिक समुदाय देश की व्यापक पहचान का हिस्सा हैं। उनके अनुसार अलग-अलग होना समस्या नहीं है, बल्कि एक-दूसरे के अधिकारों और सम्मान को स्वीकार न करना सामाजिक तनाव का कारण बन सकता है।
उन्होंने संवाद को सामाजिक दूरी कम करने का माध्यम बताते हुए कहा कि केवल एक बड़ी जनसभा से समाज की दरारें रातों-रात खत्म नहीं हो सकतीं। इसके लिए लगातार संपर्क, संवाद और एक-दूसरे के साथ बैठने की जरूरत होती है।
चौधरी अजित सिंह की कर्मभूमि मुजफ्फरनगर का किया जिक्र
जयंत चौधरी ने मुजफ्फरनगर को अपने पिता और पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वर्गीय चौधरी अजित सिंह की कर्मभूमि बताते हुए उनके सामाजिक आंदोलनों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि चौधरी अजित सिंह ने समाज के अलग-अलग वर्गों को जोड़ने और सामाजिक दूरी कम करने के लिए काम किया।
उनके अनुसार चौधरी अजित सिंह की राजनीति में किसानों और ग्रामीण समाज के मुद्दों को विशेष महत्व मिला। मुजफ्फरनगर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीतिक पहचान में चौधरी अजित सिंह की भूमिका का उल्लेख करते हुए जयंत ने कहा कि समाज को बांटने के बजाय लोगों को जोड़ना ही स्थायी रास्ता है।
उन्होंने कार्यकर्ताओं से भी सामाजिक संपर्क को केवल राजनीतिक कार्यक्रमों तक सीमित न रखने का आह्वान किया। उनका कहना था कि विभिन्न वर्गों के लोगों के साथ निरंतर संवाद से ही भरोसा मजबूत हो सकता है।
अंबेडकर और चौधरी चरण सिंह की विचारधारा को बताया आधार
जयंत चौधरी ने अपने संबोधन में डॉ. भीमराव अंबेडकर और पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के विचारों को भी प्रमुखता से सामने रखा। उन्होंने कहा कि जातिवाद और सामाजिक असमानता के खिलाफ संतों, महापुरुषों और किसानों के नेताओं ने लंबे समय तक संघर्ष किया है।
डॉ. अंबेडकर के बारे में बोलते हुए उन्होंने कहा कि बाबा साहेब को किसी एक रंग, वर्ग या सामाजिक पहचान तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। उनके विचार समानता, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़े हैं।
जयंत चौधरी ने भारतीय तिरंगे के रंगों का संदर्भ देते हुए भी अंबेडकर के विचारों को समानता और सामाजिक न्याय से जोड़ा। उन्होंने कहा कि बाबा साहेब की विरासत को व्यापक भारतीय संदर्भ में देखने की जरूरत है।
चौधरी चरण सिंह की ‘जाति तोड़ो’ सोच का किया उल्लेख
चौधरी चरण सिंह की विरासत का जिक्र करते हुए जयंत चौधरी ने उनके द्वारा किए गए ‘जाति तोड़ो सम्मेलनों’ की चर्चा की। उन्होंने कहा कि चौधरी चरण सिंह ने सामाजिक विभाजन को चुनौती देने और किसानों तथा ग्रामीण समाज को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाने का काम किया।
जयंत ने चौधरी चरण सिंह को अपना आदर्श और साहस का स्रोत बताते हुए कहा कि उनकी राजनीति को केवल किसी एक जातीय समीकरण के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि रालोद और जनता के बीच संबंध केवल जातिगत गणित पर आधारित नहीं हैं। उनके अनुसार चौधरी चरण सिंह और डॉ. अंबेडकर की जोड़ने वाली विचारधारा को संगठन के सामाजिक आधार से जोड़ा जाना चाहिए।
‘टीम रालोद’ को बताया समाज और सरकार के बीच सेतु
सम्मेलन में जयंत चौधरी ने ‘टीम रालोद’ की भूमिका पर भी बात की। उन्होंने कहा कि पार्टी कार्यकर्ताओं को समाज और सरकार के बीच एक सेतु के रूप में काम करना चाहिए।
उनके अनुसार किसी भी राजनीतिक संगठन की जिम्मेदारी केवल चुनाव के दौरान सक्रिय रहना नहीं है। कार्यकर्ताओं को आम लोगों की समस्याओं को समझना, संबंधित स्तर तक पहुंचाना और सरकारी योजनाओं तथा नागरिकों के बीच संपर्क स्थापित करने में भूमिका निभानी चाहिए।
उन्होंने कार्यकर्ताओं से गांव-गांव संपर्क बढ़ाने और सामाजिक संवाद को मजबूत करने का आह्वान किया।
युवाओं पर जयंत का फोकस, गांवों तक स्टार्टअप पहुंचाने की बात
सम्मेलन में जयंत चौधरी ने युवाओं और उद्यमिता को लेकर भी अपना दृष्टिकोण सामने रखा। उन्होंने कहा कि भारत के युवाओं के पास नए विचार, ऊर्जा और जोखिम उठाने का साहस है। जरूरत इस बात की है कि युवाओं को अपने विचारों को व्यवसाय और रोजगार के अवसर में बदलने के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध हों।
उन्होंने कहा कि स्टार्टअप और उद्यमिता का वातावरण केवल महानगरों और बड़े कॉरपोरेट कार्यालयों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं को भी तकनीक, प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और बाजार से जुड़ने के अवसर मिलना जरूरी है।
जयंत चौधरी ने युवाओं से कहा कि वे राजनीतिक नारों तक अपने सवालों को सीमित न रखें। उनके मुताबिक खेती, रोजगार, कारोबार, नई तकनीक, नवाचार और फसलों के उचित मूल्य जैसे विषय युवाओं की प्राथमिक बहस में होने चाहिए।
गांव का युवा भी बन सकता है उद्यमी
ग्रामीण भारत में रोजगार की तस्वीर बदलने के लिए केवल सरकारी नौकरी पर निर्भरता कम करने और स्थानीय स्तर पर उद्यमिता को बढ़ाने की जरूरत पर जयंत चौधरी ने जोर दिया।
खेती से जुड़े परिवारों के युवाओं के सामने कृषि आधारित व्यवसाय, खाद्य प्रसंस्करण, एग्री-टेक, मशीनरी, लॉजिस्टिक्स, डिजिटल सेवाओं और अन्य ग्रामीण उद्यमों के अवसर हो सकते हैं। सरकार और संस्थाओं की ओर से कौशल प्रशिक्षण और उद्यमिता संबंधी योजनाओं की जानकारी गांवों तक पहुंचना इस दिशा में महत्वपूर्ण हो सकता है।
जयंत चौधरी ने इसी व्यापक सोच के तहत युवाओं को नए अवसरों से जोड़ने की बात कही।
किसानों के मुद्दे पर गन्ने की कीमत और भुगतान का जिक्र
सम्मेलन में किसान और गन्ना भुगतान भी जयंत चौधरी के भाषण का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। उन्होंने गन्ने की कीमत और किसानों को किए गए भुगतान का उल्लेख करते हुए केंद्र सरकार की एथेनॉल नीति को भी किसानों से जोड़कर प्रस्तुत किया।
जयंत चौधरी ने कहा कि किसान की फसल की पर्ची उसके अधिकार से जुड़ा विषय है। उन्होंने पूर्ववर्ती सरकारों के समय गन्ने के भाव का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय यह 305 रुपये प्रति क्विंटल तक था, जबकि पिछले सत्र में यह 400 रुपये तक पहुंचा।
उन्होंने दावा किया कि एथेनॉल नीति के चलते गन्ना क्षेत्र में भुगतान व्यवस्था में सुधार हुआ है और गन्ना मूल्य का लगभग 95 प्रतिशत भुगतान किया जा चुका है। उनके मुताबिक किसानों के खातों में तीन लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि पहुंचाई गई है।
इन आंकड़ों और नीतिगत दावों को जयंत चौधरी ने केंद्र सरकार की किसान नीति के संदर्भ में रखा और विपक्ष से सवाल किया कि किसान की आर्थिक स्थिति और कृषि आय से जुड़े मुद्दे राजनीतिक एजेंडे में पर्याप्त जगह क्यों नहीं पाते।
एथेनॉल नीति और गन्ना अर्थव्यवस्था पर जोर
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ना केवल एक फसल नहीं बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। गन्ने की खेती से किसान, चीनी मिलें, श्रमिक, परिवहन क्षेत्र और स्थानीय बाजार जुड़े हुए हैं।
इसी कारण गन्ने के भुगतान, मूल्य और चीनी मिलों की स्थिति जैसे मुद्दे पश्चिमी यूपी की राजनीति में लगातार चर्चा में रहते हैं। जयंत चौधरी ने अपने भाषण में एथेनॉल नीति को इसी व्यापक कृषि अर्थव्यवस्था के संदर्भ में रखा।
उन्होंने कहा कि किसानों के हित से जुड़े मुद्दों पर राजनीतिक बहस केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि किसानों को वास्तविक आर्थिक लाभ कितना मिला, भुगतान की स्थिति क्या है और आगे क्या किया जाना चाहिए—इन सवालों पर चर्चा होनी चाहिए।
अल्पसंख्यकों और वंचित वर्गों के सम्मान की बात
सम्मेलन में जयंत चौधरी ने अल्पसंख्यकों और समाज के वंचित वर्गों के प्रति सम्मान की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में प्रत्येक समुदाय को बराबरी, सुरक्षा और सम्मान की भावना मिलनी चाहिए।
उन्होंने सामाजिक समरसता को केवल जातीय या राजनीतिक समीकरण के रूप में देखने के बजाय व्यापक सामाजिक संवाद से जोड़ने की बात कही। उनके अनुसार समाज के किसी भी वर्ग को अलग-थलग महसूस नहीं होना चाहिए।
जयंत चौधरी ने रालोद कार्यकर्ताओं से कहा कि वे सभी समुदायों तक पहुंचें और संवाद को बढ़ावा दें।
‘भेदभाव नहीं, समानता; दूरी नहीं, संवाद; टकराव नहीं, समन्वय’
जयंत चौधरी ने कार्यकर्ताओं के लिए सामाजिक संपर्क अभियान का संदेश भी दिया। उन्होंने कहा कि कार्यकर्ताओं को ‘भेदभाव नहीं—समानता, दूरी नहीं—संवाद और टकराव नहीं—समन्वय’ का संदेश लेकर गांव-गांव और घर-घर तक पहुंचना चाहिए।
पार्टी की ओर से बताए गए कार्यक्रम के अनुसार इस अभियान को व्यापक स्तर पर चलाने की बात कही गई है। हालांकि मूल बयान में ‘31 सितंबर’ की तारीख दी गई है, जबकि सितंबर में 30 दिन होते हैं; इसलिए इस तारीख को प्रकाशित करने से पहले रालोद की आधिकारिक पुष्टि करना उचित होगा। उपलब्ध रिपोर्टों में भी यही ‘31 सितंबर’ उल्लेखित है।
मुजफ्फरनगर में रालोद के कई वरिष्ठ नेता रहे मौजूद
सामाजिक समरसता सम्मेलन में जयंत चौधरी के अलावा उत्तर प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री अनिल कुमार, रालोद के विधानमंडल दल के नेता राजपाल बालियान, राज्यमंत्री कपिल देव अग्रवाल, प्रदेश अध्यक्ष ऐश्वर्य चौधरी, जिलाध्यक्ष संजय राठी और क्षेत्रीय अध्यक्ष तरसपाल मलिक सहित कई नेता मौजूद रहे।
अन्य रिपोर्टों में बिजनौर सांसद चंदन चौहान तथा विधायक मदन भैया, अशरफ अली खान, गुलाम मोहम्मद और प्रसन्न चौधरी की मौजूदगी का भी उल्लेख किया गया है। कार्यक्रम को लेकर रालोद कार्यकर्ताओं ने पहले से ही ग्रामीण क्षेत्रों में जनसंपर्क अभियान चलाया था।
2027 से पहले पश्चिमी यूपी में बढ़ी राजनीतिक सक्रियता
मुजफ्फरनगर में आयोजित यह सम्मेलन राजनीतिक रूप से भी इसलिए चर्चा में रहा क्योंकि उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले विभिन्न राजनीतिक दलों की गतिविधियां बढ़ रही हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान, गन्ना, रोजगार, सामाजिक समीकरण और क्षेत्रीय विकास जैसे मुद्दे लंबे समय से राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रहे हैं।
रालोद ने अपने सम्मेलन को सामाजिक समरसता के मुद्दे से जोड़ा, जबकि जयंत चौधरी के भाषण में विपक्ष पर राजनीतिक हमला, किसान हित, युवा उद्यमिता और सामाजिक संवाद सभी एक साथ दिखाई दिए।
पार्टी की ओर से सम्मेलन से पहले गांव-गांव संपर्क और लोगों को कार्यक्रम में जोड़ने की तैयारी की गई थी।
पश्चिमी यूपी के विकास और स्थानीय मुद्दों पर भी जोर
जयंत चौधरी ने व्यापक राजनीतिक बहस को स्थानीय विकास से जोड़ने की कोशिश की। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कृषि के साथ-साथ औद्योगिक विकास, रोजगार, शिक्षा, कनेक्टिविटी और नई तकनीक से जुड़े अवसरों की भी चर्चा लगातार होती रही है।
युवा वर्ग के लिए स्थानीय स्तर पर रोजगार और उद्यमिता के अवसर पैदा करना क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में भूमिका निभा सकता है। इसी संदर्भ में जयंत चौधरी ने स्टार्टअप और नवाचार को गांवों तक ले जाने की बात कही।
उनके भाषण में यह संदेश भी रहा कि ग्रामीण युवाओं को केवल नौकरी तलाशने वाला नहीं, बल्कि रोजगार पैदा करने वाला उद्यमी बनने के अवसर भी मिलने चाहिए।
सामाजिक समरसता को केवल मंच का विषय बनाने के बजाय जमीन पर उतारने की चुनौती
मुजफ्फरनगर में सम्मेलन के दौरान सामाजिक समरसता का संदेश जोरदार तरीके से सामने आया, लेकिन इस विचार को जमीन पर उतारने के लिए लगातार सामाजिक संवाद की आवश्यकता होती है। अलग-अलग समुदायों के बीच आर्थिक और सामाजिक रिश्ते पश्चिमी यूपी की ग्रामीण व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
किसान, मजदूर, व्यापारी, युवा, छोटे उद्यमी और विभिन्न सामाजिक वर्ग स्थानीय अर्थव्यवस्था में एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इसलिए सामाजिक तनाव का असर केवल राजनीतिक माहौल पर नहीं, बल्कि स्थानीय आर्थिक संबंधों पर भी पड़ सकता है।
जयंत चौधरी ने अपने भाषण में इसी पारस्परिक निर्भरता को समझने और संवाद बढ़ाने की बात कही।
राजनीतिक हमले के बीच किसान और युवा एजेंडा भी रहा केंद्र में
सम्मेलन में जयंत चौधरी का भाषण केवल विपक्षी आलोचना तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने किसान, गन्ना भुगतान, एथेनॉल, युवाओं, स्टार्टअप, रोजगार और सामाजिक समानता जैसे मुद्दों को भी प्रमुखता दी।
उनका संदेश था कि राजनीतिक बहस को केवल जातीय पहचान या नारों तक सीमित रखने के बजाय रोजमर्रा की आर्थिक और सामाजिक समस्याओं पर भी केंद्रित किया जाना चाहिए।
विपक्ष पर उनकी टिप्पणियां राजनीतिक रूप से स्वाभाविक रूप से चर्चा का विषय बनीं, लेकिन सम्मेलन का दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा वह एजेंडा रहा जिसमें युवाओं और किसानों के आर्थिक अवसरों को लेकर बात की गई।
जयंत चौधरी का संदेश: संवाद से कम होगी सामाजिक दूरी
जयंत चौधरी ने कहा कि समाज को जोड़ने के लिए केवल राजनीतिक मंच पर्याप्त नहीं हैं। अलग-अलग वर्गों को एक-दूसरे के साथ बैठना होगा, बातचीत करनी होगी और अपने बीच मौजूद सामाजिक एवं आर्थिक संबंधों को समझना होगा।
उनके अनुसार सामाजिक समरसता किसी एक कार्यक्रम का परिणाम नहीं हो सकती। इसके लिए निरंतर संपर्क और संवाद जरूरी है।
मुजफ्फरनगर जैसे सामाजिक और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जिले में इस संदेश का अपना अलग महत्व है, क्योंकि यहां किसान राजनीति, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और विभिन्न सामाजिक समुदायों के आपसी संबंध लंबे समय से राजनीतिक चर्चा का हिस्सा रहे हैं।
पचेंडा सम्मेलन से रालोद ने दिया व्यापक सामाजिक संदेश
मुस्तफाबाद पचेंडा के जनता इंटर कॉलेज में आयोजित सम्मेलन में रालोद ने सामाजिक समरसता को केंद्रीय विषय बनाकर अपनी राजनीतिक और सामाजिक प्राथमिकताओं को सामने रखा। जयंत चौधरी ने विपक्षी नारों पर सवाल उठाए, लेकिन साथ ही युवाओं और किसानों से जुड़े मुद्दों को भी अपने भाषण का हिस्सा बनाया।
डॉ. भीमराव अंबेडकर, संत रविदास और चौधरी चरण सिंह के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने समानता, सामाजिक न्याय, किसान हित और भाईचारे की बात की। साथ ही कार्यकर्ताओं को गांव-गांव जाकर संवाद बढ़ाने का संदेश दिया।
सम्मेलन में मौजूद पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए यह आयोजन संगठनात्मक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण रहा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रालोद के सामाजिक आधार और राजनीतिक गतिविधियों के बीच मुजफ्फरनगर का यह कार्यक्रम आने वाले महीनों में पार्टी की रणनीति को समझने के लिए भी महत्वपूर्ण घटनाओं में गिना जा सकता है।
मुजफ्फरनगर के पचेंडा में आयोजित सामाजिक समरसता सम्मेलन में जयंत चौधरी ने समाज में समानता, संवाद और आपसी सम्मान की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने विपक्ष के ‘तीन शब्दों’ वाले नारे को लेकर राजनीतिक हमला करते हुए कहा कि समाज को पहचान के आधार पर बांटने के बजाय किसान, युवा, रोजगार, शिक्षा, उद्यमिता और विकास जैसे मुद्दों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। सम्मेलन में डॉ. भीमराव अंबेडकर, संत रविदास और चौधरी चरण सिंह की विरासत का उल्लेख करते हुए सर्वसमाज की भागीदारी और सामाजिक संवाद को आगे बढ़ाने की बात कही गई।
