Muzaffarnagar सावन की पावन कांवड़ यात्रा में जहां हर वर्ष विभिन्न प्रकार की आकर्षक और अनोखी कांवड़ें लोगों का ध्यान खींचती हैं, वहीं इस बार मुजफ्फरनगर की सड़कों पर पहुंची एक विशेष कांवड़ ने हर किसी को भावुक कर दिया। गाजियाबाद के चार शिवभक्त युवकों ने अपने 90 वर्षीय दादा को कंधों पर बैठाकर हरिद्वार से गंगाजल लेकर पैदल कांवड़ यात्रा शुरू की है। श्रद्धालु इस अनूठी सेवा भावना को आधुनिक समय में ‘श्रवण कुमार’ की परंपरा का जीवंत उदाहरण बता रहे हैं।

जब यह विशेष झूला कांवड़ मुजफ्फरनगर की कच्ची सड़क क्षेत्र में पहुंची तो इसे देखने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। राहगीर रुक-रुककर इस दृश्य को निहारते रहे और कई लोगों ने युवकों की सेवा भावना की सराहना करते हुए उनके साथ तस्वीरें और वीडियो भी बनाए।


एक ओर 51 लीटर गंगाजल, दूसरी ओर 90 वर्षीय दादा, कंधों पर उठाए चल रहे चार पोते

इस अनोखी कांवड़ को विशेष रूप से तैयार किया गया है। झूला शैली की इस कांवड़ के एक हिस्से में 51 लीटर पवित्र गंगाजल सुरक्षित रखा गया है, जबकि दूसरे हिस्से में परिवार के 90 वर्षीय दादा विराजमान हैं।

बताया गया कि कांवड़, गंगाजल और दादा का कुल वजन लगभग 150 किलोग्राम है। इतनी भारी कांवड़ को लेकर पैदल यात्रा करना आसान नहीं है, लेकिन चारों पोते बारी-बारी से इसे अपने कंधों पर उठाकर यात्रा पूरी कर रहे हैं।

उनकी इस तपस्या और समर्पण को देखकर रास्ते में मिलने वाले श्रद्धालु ‘हर-हर महादेव’ और ‘बम-बम भोले’ के जयघोष के साथ उनका उत्साहवर्धन कर रहे हैं।


भोलेनाथ से लिया था विशेष संकल्प

शिवभक्त मनजीत ने बताया कि उन्होंने भगवान भोलेनाथ से एक विशेष संकल्प लिया था। इसी संकल्प के अनुसार उन्होंने अपने दादा को स्वयं कंधों पर बैठाकर हरिद्वार ले जाने, उन्हें पवित्र गंगा स्नान कराने और फिर भगवान शिव के जलाभिषेक के लिए गंगाजल लेकर पैदल यात्रा करने का निर्णय लिया।

उन्होंने कहा कि यह केवल धार्मिक यात्रा नहीं बल्कि परिवार के सबसे बुजुर्ग सदस्य के प्रति सम्मान और सेवा का प्रतीक है।

मनजीत के अनुसार, भगवान शिव की कृपा और परिवार के सहयोग से यह संकल्प पूरा किया जा रहा है।


चारों भाई बारी-बारी से उठाते हैं 150 किलो की कांवड़

इतनी भारी कांवड़ लेकर लंबी दूरी तक पैदल चलना अत्यंत चुनौतीपूर्ण कार्य है।

मनजीत ने बताया कि चारों भाई आपस में जिम्मेदारी बांटकर यात्रा कर रहे हैं। कुछ दूरी तक एक भाई कांवड़ उठाता है, फिर दूसरा उसकी जगह ले लेता है। आवश्यकता पड़ने पर सभी विश्राम भी करते हैं ताकि यात्रा सुरक्षित और व्यवस्थित ढंग से पूरी हो सके।

उन्होंने बताया कि यात्रा के दौरान अनुशासन, धैर्य और आपसी सहयोग सबसे महत्वपूर्ण है। इसी कारण चारों भाई पूरे समर्पण के साथ इस कठिन यात्रा को आगे बढ़ा रहे हैं।


रास्ते भर मिल रहा श्रद्धालुओं का प्यार और सम्मान

कांवड़ यात्रा के दौरान जहां-जहां यह अनोखी कांवड़ पहुंचती है, वहां लोग कुछ देर रुककर इस सेवा भावना को निहारते हैं।

मुजफ्फरनगर पहुंचने पर भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस विशेष कांवड़ को देखने पहुंचे। कई लोगों ने चारों युवकों का फूलों से स्वागत किया, जबकि अनेक श्रद्धालुओं ने उनके साथ तस्वीरें और वीडियो बनाकर इस प्रेरणादायक क्षण को अपने मोबाइल में कैद किया।

‘हर-हर महादेव’ और ‘बोल बम’ के जयघोषों के बीच यह कांवड़ यात्रा लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी रही।


बुजुर्गों की सेवा का दिया भावनात्मक संदेश

मनजीत ने कहा कि आज की व्यस्त जीवनशैली में लोग कई बार अपने माता-पिता और दादा-दादी के साथ पर्याप्त समय भी नहीं बिता पाते।

उन्होंने कहा कि इस यात्रा का उद्देश्य केवल धार्मिक आस्था प्रकट करना नहीं बल्कि समाज को यह संदेश देना भी है कि बुजुर्गों का सम्मान और उनकी सेवा प्रत्येक परिवार का पहला कर्तव्य होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि यदि हर व्यक्ति अपने घर के वरिष्ठ सदस्यों का सम्मान करेगा तो समाज में संस्कार, अपनापन और पारिवारिक मूल्यों की जड़ें और मजबूत होंगी।


श्रवण कुमार की परंपरा की दिलाई याद

इस अनोखी कांवड़ को देखकर अनेक श्रद्धालुओं ने इसे पौराणिक कथा के श्रवण कुमार की सेवा भावना से जोड़कर देखा।

भारतीय परंपरा में श्रवण कुमार को माता-पिता की सेवा और समर्पण का आदर्श माना जाता है। श्रद्धालुओं का कहना था कि आधुनिक समय में भी यदि युवा अपने बुजुर्गों के प्रति इसी प्रकार का सम्मान और समर्पण दिखाएं तो पारिवारिक संबंध और सामाजिक संस्कार दोनों अधिक मजबूत होंगे।

हालांकि यह यात्रा श्रद्धालुओं की व्यक्तिगत आस्था और संकल्प का हिस्सा है, लेकिन इससे जुड़ा सेवा और सम्मान का संदेश लोगों को गहराई से प्रभावित कर रहा है।


सावन में आस्था के साथ सामाजिक संदेश भी

सावन की कांवड़ यात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि सेवा, अनुशासन, संयम और सामाजिक एकता का भी प्रतीक मानी जाती है।

हर वर्ष लाखों श्रद्धालु हरिद्वार से पवित्र गंगाजल लेकर भगवान शिव का जलाभिषेक करने निकलते हैं। इस दौरान कई शिवभक्त समाज सेवा, पर्यावरण संरक्षण, रक्तदान और जनजागरूकता जैसे संदेश भी देते हैं।

इस वर्ष गाजियाबाद के इन चार युवकों की यह अनूठी कांवड़ बुजुर्गों के सम्मान और पारिवारिक मूल्यों को केंद्र में रखकर लोगों के बीच प्रेरणा का विषय बन गई है।


मुजफ्फरनगर में श्रद्धालुओं ने की जमकर सराहना

मुजफ्फरनगर पहुंची इस अनोखी कांवड़ को देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु एकत्रित हुए। लोगों ने चारों युवकों की सेवा भावना की खुलकर प्रशंसा की और उनके संकल्प को प्रेरणादायक बताया।

कई श्रद्धालुओं का कहना था कि धार्मिक आस्था तभी और अधिक सार्थक बनती है जब उसके साथ सेवा, त्याग और परिवार के प्रति सम्मान की भावना भी जुड़ी हो। चारों युवकों की यह यात्रा केवल भगवान शिव के प्रति श्रद्धा का प्रतीक नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति में बुजुर्गों के सम्मान की परंपरा को भी जीवंत करती दिखाई दी।

महत्वपूर्ण: गाजियाबाद के चार शिवभक्त युवकों द्वारा अपने 90 वर्षीय दादा को विशेष झूला कांवड़ में बैठाकर हरिद्वार से गंगाजल लाने की यह यात्रा उनकी व्यक्तिगत आस्था और संकल्प का हिस्सा है। इस पहल ने कांवड़ यात्रा के दौरान बुजुर्गों के सम्मान, पारिवारिक मूल्यों और सेवा भावना का सकारात्मक संदेश दिया है, जिसकी मुजफ्फरनगर में श्रद्धालुओं ने सराहना की।

 



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