भारत के सामने अब चुनौती केवल कम या ज्यादा बारिश की नहीं, बल्कि बदलते मानसून-पैटर्न की है। वर्ष 2026 में देश ने 1901 के बाद का पांचवां सबसे सूखा जून देखा। कई राज्यों में मानसून करीब दो सप्ताह तक ठहरा रहा, जबकि कुछ क्षेत्रों में कुछ ही घंटों की मूसलाधार बारिश ने बाढ़ जैसे हालात बना दिए।
मौसम वैज्ञानिक इसे भारतीय मानसून के बदलते पैटर्न का संकेत मान रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि सबसे बड़ा खतरा बारिश की कमी नहीं, उसकी अनिश्चितता है। यदि यही प्रवृत्ति रही तो भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती कम वर्षा नहीं, बल्कि उसका अनिश्चित और असमान वितरण है। यह बदलाव खेती, जल सुरक्षा और शहरों के लिए सबसे बड़ा जोखिम बन सकता है।
2700 वर्षों के इतिहास से मिले अहम संकेत
लखनऊ स्थित बीएसआईपी की लगभग 2700 वर्षों के मानसूनी इतिहास पर आधारित अध्ययन ने इस बहस को नया आधार दिया है। बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान के निदेशक प्रो. एमजी. ठक्कर की निगरानी में वैज्ञानिक डॉ. अंजलि, अनुपम ने मध्य प्रदेश के बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व की प्राचीन झीलों की तलछट में सुरक्षित जीवाश्म परागकणों और वनस्पति अवशेषों का अध्ययन कर पिछले करीब 2700 वर्षों के मानसून, वनस्पति और मानव गतिविधियों का डाटा जुटाया है।
अध्ययन में बताया गया कि भारतीय मानसून पहले भी कई बार अपने स्वभाव में बड़े बदलाव ला चुका है। हर बदलाव के साथ जंगल, खेती और मानव बसावट का स्वरूप भी बदला। अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका ””क्वार्टनरी रिसर्च””ने इसे प्रकाशित किया है।
