इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि यदि किसी मामले में लगाए गए आरोप प्रथमदृष्टया अपराध का संकेत देते हैं तो केवल इस आधार पर आरोपियों को राहत नहीं दी जा सकती कि पक्षकारों के बीच दीवानी विवाद भी लंबित है। अदालत ने स्पष्ट किया कि दीवानी और आपराधिक कार्रवाई एक साथ चल सकती हैं।
न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की एकल पीठ ने यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें आरोपियों ने ट्रायल कोर्ट द्वारा उनकी आरोपमुक्ति अर्जी खारिज किए जाने के आदेश को चुनौती दी थी। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन बनाम एनईपीसी इंडिया लिमिटेड मामले का हवाला देते हुए कहा कि एक ही घटना से दीवानी और आपराधिक दोनों प्रकार के विवाद उत्पन्न हो सकते हैं। केवल दीवानी उपचार उपलब्ध होने या उसके उपयोग से आपराधिक कार्यवाही समाप्त नहीं की जा सकती। मुख्य प्रश्न यह है कि शिकायत में आपराधिक अपराध के आवश्यक तत्व मौजूद हैं या नहीं।
मामले में शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि आरोपियों ने उसके मकान पर जबरन कब्जा कर लिया और सामान निकालकर ले गए। इस संबंध में दीवानी मुकदमा दायर होने पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश भी पारित हुआ था। पुलिस द्वारा एफआईआर दर्ज न करने पर अदालत के आदेश से मुकदमा दर्ज हुआ। जांच के बाद नौ लोगों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किए गए।
हाईकोर्ट ने पाया कि पांचवें, छठे, आठवें और नौवें आरोपियों के नाम बाद में जोड़े गए हैं, इसलिए उन्हें आरोपमुक्त कर दिया गया। वहीं पहले से चौथे तथा सातवें आरोपी के खिलाफ कब्जा और चोरी के विशिष्ट आरोप पाए जाने पर उनके विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही जारी रखने का आदेश दिया गया।
