उत्तर प्रदेश की राजनीति में सरकारी भर्तियां हमेशा बड़ा मुद्दा रही हैं, लेकिन वर्ष 2017 से पहले का दौर ऐसा था जब सरकारी नौकरी का नाम आते ही युवाओं के मन में उम्मीद से ज्यादा अविश्वास पैदा होता था। भर्ती परीक्षाएं प्रतिभा का मंच कम और राजनीतिक संरक्षण, जातीय समीकरण, सिफारिश और भ्रष्टाचार का अखाड़ा ज्यादा दिखाई देती थीं।
समाजवादी पार्टी के पांच वर्षों (2012-17) के शासनकाल में जहां करीब सवा लाख सरकारी नौकरियां ही सृजित हुई, वहीं योगी आदित्यनाथ सरकार ने 2017 के बाद 9 वर्षों में 9 लाख से अधिक सरकारी नौकरियां देकर रिकॉर्ड कायम किया। यह अंतर केवल संख्या का नहीं, बल्कि व्यवस्था और नीयत का भी है। योगी सरकार लगातार यह संदेश देती रही है कि सरकारी नौकरी अब बंद कमरे की सिफारिश या लेन-देन आधारित व्यवस्था से निकलकर तकनीक आधारित पारदर्शी सिस्टम में बदल चुकी है।
सपा राज में भर्ती नहीं, सत्ता संरक्षित बंदरबांट
समाजवादी पार्टी के शासनकाल में भर्ती प्रक्रियाओं पर लगातार पेपर लीक, चयन सूची में गड़बड़ी, इंटरव्यू में पक्षपात और भाई-भतीजावाद के आरोप लगते रहे। ऐसी त्रुटिपूर्ण प्रक्रिया अपनाई जाती कि कोर्ट से नियुक्तियों पर रोक लग जाती। गांव-कस्बों का मेहनती युवा, जो दिन-रात पढ़ाई कर सरकारी नौकरी का सपना देखता था, वह खुद को उस व्यवस्था के सामने असहाय महसूस करता था जहां योग्यता से ज्यादा “पहचान” मायने रखती थी।
2012 से 2017 के बीच सरकारी भर्तियों को लेकर सबसे बड़ा आरोप यही रहा कि व्यवस्था पर एक खास राजनीतिक व जातीय नेटवर्क हावी था। चयन सूचियां आते ही चर्चा शुरू हो जाती थी कि किस नेता के करीबी, किस पदाधिकारी के रिश्तेदार और किस सत्ता संरक्षित समूह को फायदा मिला। युवाओं के बीच यह धारणा गहरी हो चुकी थी कि बिना राजनीतिक पहुंच और सिफारिश के सरकारी नौकरी मिलना लगभग असंभव है।
भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक, सॉल्वर गैंग, इंटरव्यू में पक्षपात और वर्षों तक कोर्ट में अटकी भर्तियां आम बात बन चुकी थीं। सबसे गंभीर बात यह थी कि भर्ती व्यवस्था पर जनता का भरोसा टूटने लगा था। मेहनत करने वाला अभ्यर्थी खुद को ठगा हुआ महसूस करता था। लाखों युवाओं की उम्र भर्ती विवादों, निरस्त परीक्षाओं और कानूनी लड़ाइयों में निकल गई। सरकारी नौकरी, जो निष्पक्ष अवसर का प्रतीक होनी चाहिए थी, उसे सत्ता समर्थकों में बांटे जाने वाले राजनीतिक इनाम की तरह देखा जाने लगा।
