बरेली में बीते साल 26 सितंबर को हुए बवाल को पूरा एक साल बीत गया है। मुख्य आरोपी मौलाना तौकीर रजा खान सलाखों के पीछे है। शहर कानून-व्यवस्था की बहाली का दम भर रहा है। हालांकि, बड़ा सवाल यह है कि क्या यह बवाल अचानक हुआ था? या फिर यह पुलिस-प्रशासन की दो दशकों की उस अनदेखी और लापरवाही का नतीजा है, जिसने छोटी सी चूक को बड़े बवाल का रूप दे दिया।
अमर उजाला के पास मौजूद 13 अक्तूबर 2006 के अति-गोपनीय दस्तावेज (पत्र सं. एसटी-सीआर 12/06) पुलिस की सुस्ती की पोल खोलते हैं। 19 साल पहले चेतावनी मिलने के बावजूद पुलिस-प्रशासन ने आंखें मूंद ली थीं। नतीजा बवाल के रूप में सामने आया।
वर्ष 2006 में तैयार की थी रिपोर्ट
वर्ष 2025 में शहर में हुए बवाल के बाद मुख्य आरोपी और इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल के प्रमुख मौलाना तौकीर रजा खान और सचिव डॉ. नफीस अभी भी जेल में हैं। इन दोनों आरोपियों पर कार्रवाई के लिए वर्ष 2006 में ही पुलिस ने रिपोर्ट तैयार की थी, मगर वह फाइल से बाहर नहीं निकल पाई।
दरअसल, 19 वर्ष पहले जुलाई 2006 में आईएमसी प्रमुख ने बयान दिया था कि इंसाफ मिलता रहे तो कोई बम नहीं रखेगा और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना देशद्रोह नहीं। इस बयान की शिकायत के बाद पुलिस ने पूरी जांच रिपोर्ट तैयार की।
