चंबल सफारी, होलीपुरा की हवेलियां और बटेश्वर के मंदिरों के दर्शन के लिए आए विदेशी पर्यटकों को जरार की ग्रामीण संस्कृति, खान-पान और परंपराओं ने मंत्रमुग्ध कर दिया। रविवार को जरार भ्रमण पर निकले इंग्लैंड के पर्यटकों ने जब होली चौराहे पर कढ़ाई में बनती लच्छेदार और मलाईदार रबड़ी देखी तो वे ठिठक गए।

ग्रामीण अनुभव और स्थानीय व्यंजन: पर्यटकों ने अपने गाइड प्रदीप जैन से रबड़ी के बारे में जानकारी ली और उसका स्वाद चखा। इसके बाद उन्होंने कुल्हड़ में चाय और जलेबी का भी आनंद लिया। जेनिफर, एनी, मेल्कम और एलिश जैसे पर्यटकों ने घूमते चाक पर दिवाली के लिए दीये बनाते हुए देखकर आश्चर्य व्यक्त किया। गाइड प्रदीप जैन और गजेंद्र सिंह डांगर ने उन्हें बताया कि ये दीये दिवाली पर घरों को रोशन करने के लिए बनाए जा रहे हैं और लक्ष्मी-गणेश की पूजा में इनका उपयोग होगा।

ग्रामीण संस्कृति को करीब से देखकर पर्यटक बेहद उत्साहित दिखे और उन्होंने तस्वीरें भी खींचीं। रास्ते में तिरपाल पर बाजरा सूखता देख उन्होंने फोटो खींचे। गाइड ने बताया कि बाजरा स्थानीय आहार का महत्वपूर्ण हिस्सा है और सर्दियों में लोग सरसों का साग और बाजरे की रोटी का आनंद लेते हैं। बाजरे के आटे से बनी तिल की टिक्की भी उन्हें खूब पसंद आई। देशी खान-पान के बारे में जानकर वे काफी प्रभावित हुए। पर्यटकों ने बताया कि वे चंबल सफारी और बटेश्वर के मंदिर देखने आए थे, लेकिन जरार की ग्रामीण संस्कृति और परिवेश ने उन्हें विशेष रूप से आकर्षित किया।

बच्चों से मिला अपनापन: जरार भ्रमण के दौरान, स्थानीय बेटियों, जैसे नेंसी, राधिका, बिट्टो, अंशू और कोमल ने पर्यटकों का “वेलकम इन इंडिया” कहकर स्वागत किया। पर्यटकों के रुकने पर बेटियों ने उनके साथ सेल्फी ली। जेनिफर और एनी ने छोटे बच्चों के साथ हाथ मिलाया और बच्चों ने भी “हेलो” कहकर उनका अभिवादन किया। चाक पर दीये बना रहे रामदास के परिवार की बच्ची को अपने पास बुलाकर हाथ मिलाने से विदेशी सैलानी बेहद रोमांचित हुए। बच्चों से मिले इस अपनेपन ने उन्हें बहुत खुशी दी।

 यह घटना दर्शाती है कि विदेशी पर्यटक न केवल दर्शनीय स्थलों में रुचि रखते हैं, बल्कि भारतीय ग्रामीण जीवन की सादगी, परंपराओं और आतिथ्य सत्कार से भी गहराई से प्रभावित होते हैं। स्थानीय खान-पान और लोगों का स्नेहपूर्ण व्यवहार उनके अनुभव को अविस्मरणीय बना देता है।



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