केस – 1: एफएसडीए की जांच में ब्लड प्रेशर नियंत्रित करने की दवा टेल्मा एच भी पकड़ी गई। पता चला कि यह नकली दवा खुदरा कारोबारियों को 25 से 30 रुपये प्रति पत्ता दी गई है जबकि इसका प्रिंट मूल्य 380 रुपये प्रति पत्ता है। यह पक्के बिल पर दुकानदारों को 300 से 310 रुपये में मिलती है।
केस – 2: बवासीर के मरीजों को दी जाने वाली सिटकॉम का प्रति पत्ता प्रिंट मूल्य 980 रुपये है। नकली दवा मेडिकल स्टोर पर 100 रुपये प्रति पत्ता पहुंचाई गई। इसी तरह कफ सिरप व अन्य दवाएं भी प्रिंट मूल्य से 10 गुना कम कीमत पर स्टोर पर पहुंचाई जा रही हैं।
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प्रदेश में नकली दवाओं का कारोबार सिर्फ मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ नहीं कर रहा, बल्कि मेडिकल स्टोर संचालकों के लिए मोटी कमाई का जरिया भी बन गया है। फुटकर दवा विक्रेताओं को नामचीन कंपनियां प्रति पत्ता अधिकतम 20 फीसदी तक लाभ देती हैं जबकि नकली दवाओं पर उन्हें 10 गुना लाभ मिल रहा है। इतना ही नहीं, नकली दवाएं बेचने के बाद उनकी कीमत लौटानी नहीं पड़ती है। इसी आकर्षण में खुदरा दवा कारोबारी नकली दवाओं को स्टोर पर बेच रहे हैं। यह खुलासा खाद्य सुरक्षा एवं औषधि विभाग (एफएसडीए) की जांच में हुआ है।
एफएसडीए की टीम ने आगरा, लखनऊ, गोंडा, लखीमपुर खीरी, महराजगंज, गोरखपुर सहित विभिन्न स्थानों से करीब 20 करोड़ की नकली दवाएं जब्त की हैं। विभिन्न स्थानों पर पकड़े गए लोगों से पूछताछ में न सिर्फ पूरे नेटवर्क का खुलासा हुआ है, बल्कि इस कारोबार में मुनाफाखोरी की रणनीति भी पता चली है। सूत्रों का कहना है कि नकली दवाओं के सैंपल में न के बराबर केमिकल मिला है। सिर्फ खड़िया मिट्टी को चूने में मिलाकर टैबलेट का स्वरूप दे दिया गया है। यही वजह है कि ये दवाएं मर्ज पर बेअसर हैं।
