इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि गोकशी जैसी कोई कथित आपराधिक घटना घर की चहारदीवारी के भीतर हुई है। उससे सार्वजनिक व्यवस्था या शांति भंग नहीं होती, तो उस पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत नजरबंदी की कार्रवाई नहीं की जा सकती। न्यायमूर्ति राजीव मिश्रा और न्यायमूर्ति डॉ. अजय कुमार-द्वितीय की खंडपीठ ने शामली के निवासी समीर की ओर से दायर एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया।

याची समीर पर 23 अप्रैल 2025 को गोकशी के मामले में केस दर्ज किया गया था। इसी घटना के आधार पर जिला मजिस्ट्रेट ने 21 जुलाई 2025 को समीर के खिलाफ एनएसए के तहत 12 महीने की नजरबंदी का आदेश जारी किया। इसकी पुष्टि 19 अगस्त 2025 को उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से की गई थी। इसे याची ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि कथित घटना घर के अंदर हुई थी और उसका सार्वजनिक जीवन या कानून-व्यवस्था पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा। उन्होंने फैयाज कुरैशी बनाम भारत संघ मामले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि यदि कोई कृत्य सार्वजनिक रूप से नहीं हुआ है और न ही उससे सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ा है, तो एनएसए का आधार नहीं बनता।

कोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद पाया कि घटना के समय कोई भी सार्वजनिक अशांति या हिंसा की स्थिति उत्पन्न नहीं हुई थी। कोर्ट ने नजरबंदी आदेश को निरस्त कर दिया। साथ ही, अदालत ने निर्देश दिए कि यदि याचिकाकर्ता किसी अन्य आपराधिक मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तत्काल प्रभाव से रिहा कर दिया जाए।



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